Bhagwad Geeta As It Is in Hindi Chapter 11 श्रीमद्भगवद गीता यथारुप हिंदी अध्याय 11

Bhagwad Geeta As It Is in Hindi Chapter 11

श्रीमद्भगवद गीता यथारुप हिंदी अध्याय 11


श्रीमद्भगवद गीता हिंदी श्लोक अर्थ सहित

श्रीमद्भगवद गीता हिंदी

विराट रूप

अर्जुन उवाच
मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् |
यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम || १ ||

अर्जुनःउवाच– अर्जुन ने कहा; मत्-अनुग्रहाय– मुझपर कृपा करने के लिए; परमम्– परम; गुह्यम्– गोपनीय; अध्यात्म– आध्यात्मिक; संज्ञितम्– नाम से जाना जाने वाला, विषयक; यत्– जो; त्वया– आपके द्वारा; उक्तम्– कहे गये; वचः– शब्द; तेन– उससे; मोहः– मोह; अयम्– यह; विगतः– हट गया; मम– मेरा |

अर्जुन ने कहा – आपने जिन अत्यन्त गुह्य आध्यात्मिक विषयों का मुझे उपदेश दिया है, उसे सुनकर अब मेरा मोह दूर हो गया है |

तात्पर्य : इस अध्याय में कृष्ण को समस्त कारणों के कारण के रूप में दिखाया गया है | यहाँ तक कि वे उन महाविष्णु के भी कारण स्वरूप हैं, जिनसे भौतिक ब्रह्माण्डों का उद्भव होता है | कृष्ण अवतार नहीं हैं, वे समस्त अवतारों के उद्गम हैं | इसकी पूर्ण व्याख्या पिछले अध्याय में की गई है |

अब जहाँ तक अर्जुन की बात है, उसका कहना है कि उसका मोह दूर हो गया है | इसका अर्थ यह हुआ कि वह कृष्ण को अपना मित्र स्वरूप सामान्य मनुष्य नहीं मानता, अपितु उन्हें प्रत्येक वस्तु का कारण मानता है | अर्जुन अत्यधिक प्रबुद्ध हो चुका है और उसे प्रसन्नता है कि उसे कृष्ण जैसा मित्र मिला है, किन्तु अब वह यह सोचता है कि भले ही वह कृष्ण को हर एक वस्तु का कारण मान ले, किन्तु दूसरे लोग नहीं मानेंगे | अतः इस अध्याय में यह सबों के लिए कृष्ण की अलौकिकता स्थापित करने के लिए कृष्ण से प्रार्थना करता है कि वे अपना विराट रूप दिखलाएँ | वस्तुतः जब कोई अर्जुन की ही तरह कृष्ण के विराट रूप का दर्शन करता है, तो वह डर जाता है, किन्तु कृष्ण इतने दयालु हैं कि इस स्वरूप को दिखाने के तुरन्त बाद वे अपना मूलरूप धारण कर लेते हैं | अर्जुन कृष्ण के इस कथन को बार बार स्वीकार करता है कि वे उसके लाभ के लिए ही सब कुछ बता रहे हैं | अतः अर्जुन इसे स्वीकार करता है कि यह सब कृष्ण की कृपा से घटित हो रहा है | अब उसे पूरा विश्र्वास हो चुका है कि कृष्ण समस्त कारणों का कारण हैं और परमात्मा के रूप में प्रत्येक जीव के हृदय में विद्यमान है |

भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया |
त्वत्तः कमलपत्राक्ष महात्म्यमपि चाव्ययम् || २ ||

भव – उत्पत्ति; अप्ययौ – लय (प्रलय); हि – निश्चय ही; भूतानाम् – समस्त जीवों का; श्रुतौ – सुना गया है ; विस्तरशः – विस्तारपूर्वक; मया – मेरे द्वारा;त्वत्तः – आपसे; कमल-पत्र-अक्ष – हे कमल नयन; माहात्म्यम् – महिमा; अपि – भी; च – तथा; अव्ययम् – अक्षय,अविनाशी ।

हे कमलनयन! मैंने आपसे प्रत्येक जीव की उत्पत्ति तथा लय के विषय में विस्तार से सुना है और आपकी अक्षय महिमा का अनुभव किया है ।

तात्पर्य: अर्जुन यहाँ पर प्रसन्नता के मारे कृष्ण को कमलनयन (कृष्ण के नेत्र कमल के फूल की पंखड़ियों जैसे दीखते हैं) कहकर सम्बोधित करता है क्योंकि उन्होंने किसी पिछले अध्याय में उसे विश्र्वास दिलाया है – अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा – मैं जगत की उत्पत्ति तथा प्रलय का कारण हूँ । अर्जुन इसके विषय में भगवान् से विस्तारपूर्वक सुन चूका है । अर्जुन को यह भी ज्ञात है कि समस्त उत्पत्ति तथा प्रलय का कारण होने के अतिरिक्त वे इन सबसे पृथक् (असंग) रहते हैं । जैसा कि भगवान् ने नवें अध्याय में कहा है कि वे सर्वव्यापी हैं, तो भी वे सर्वत्र स्वयं उपस्थित नहीं रहते । यही कृष्ण काअचिन्त्य ऐश्र्वर्य है, जिसे अर्जुन स्वीकार करता है कि उसने भलीभाँति समझ लिया है ।

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एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्र्वर |
दृष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्र्वरं पुरुषोत्तम || ३ ||

एवम् – इस प्रकार;एतत् – यह; यथा- जिस प्रकार; आत्थ- कहा है; त्वम्- आपने; आत्मानम् – अपने आपको;परम-ईश्र्वर– हेपरमेश्र्वर; द्रष्टुम् – देखने केलिए; इच्छामि – इच्छा करता हूँ; ते- आपका; रूपम् – रूप; ऐश्र्वरम्- दैवी; पुरुष-उत्तम – हेपुरुषों में उत्तम।

हे पुरुषोत्तम, हे परमेश्र्वर!यद्यपि आपको मैं अपने समक्ष आपके द्वारा वर्णित आपके वास्तविक रूप में देख रहा हूँ, किन्तु मैं यह देखने का इच्छुक हूँ कि आप इस दृश्य जगत में किस प्रकार प्रविष्ट हुए हैं ।मैं आप के उसी रूप का दर्शन करना चाहता हूँ ।

तात्पर्य :भगवान् ने यह कहा कि उन्होंने अपने साक्षात् स्वरूप में ब्रह्माण्ड के भीतर प्रवेश किया है, फलतः यह दृश्यजगत सम्भव हो सका है और चल रहा है । जहाँ तक अर्जुन का सम्बन्ध है, वह कृष्ण के कथनों से प्रोत्साहित है,किन्तु भविष्य में उन लोगों को विश्र्वास दिलाने के लिए,जो कृष्ण को सामान्य पुरुष सोच सकते हैं, अर्जुन चाहता है कि वह भगवान् को उनके विराट रूप में देखे जिससे वे ब्रह्माण्ड के भीतर से काम करते हैं,यद्यपि वे इससे पृथक् हैं । अर्जुन द्वारा भगवान् के लिए पुरुषोत्तम सम्बोधन भी महत्त्वपूर्णहै । चूँकि वे भगवान् है,इसीलिए वे स्वयं अर्जुन के भीतर उपस्थित हैं, अतः वे अर्जुन की इच्छा को जानते हैं । वे यह समझते हैंकि अर्जुन को उनके विराट रूप का दर्शन करने की कोई लालसा नहीं है, क्योंकि वह उनको साक्षात् देखकर पूर्णतया संतुष्टहै । किन्तु भगवान् यह भी जानते हैं कि अर्जुन अन्यों को विश्र्वास दिलाने के लिए ही विराट रूप का दर्शन करना चाहता है । अर्जुन को इसकी पुष्टि के लिए कोई व्यक्तिगत इच्छा न थी । कृष्ण यह भी जानते हैं कि अर्जुन विराट रुप का दर्शन एक आर्दश स्थापित करने के लिए करना चाहता है, क्योंकि भविष्य में ऐसे अनेक धूर्त होंगे जो अपने आपको ईश्र्वर का अवतार बताएँगे। अतः लोगों को सावधान रहना होगा । जो कोई अपने को कृष्ण कहेगा, उसे अपने दावे की पुष्टि के लिए विराट रूप दिखाने के लिए सन्नद्ध रहना होगा ।

मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो |
योगेश्र्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम् || ४ ||

मन्यसे- तुम सोचते हो; यदि- यदि; तत् – वह; शक्यम्- समर्थ; मया – मेरे द्वारा;द्रष्टुम् – देखे जाने के लिए; इति- प्रकार;प्रभो – स्वामी; योग-ईश्र्वर- हे योगेश्र्वर; ततः- तब; मे – मुझे;त्वम् – आप; दर्शय- दिखलाइये; आत्मानम् – अपने स्वरूप को; अव्ययम्– शाश्र्वत।

हे प्रभु! हे योगेश्र्वर!यदि आप सोचतेहैं कि मैं आपके विश्र्वरूप को देखने में समर्थ हो सकता हूँ, तो कृपा करके मुझे अपना असीम विश्र्वरूप दिखलाइये।

तात्पर्य :ऐसा कहा जाता है कि भौतिक इन्द्रियों द्वारा न तो परमेश्वर कृष्ण को कोई देख सकता है,न सुन सकता है और न अनुभव कर सकता है । किन्तु यदि कोई प्रारम्भसे भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में लगा रहे, तो वह भगवान् का साक्षात्कार करने में समर्थ हो सकता है । प्रत्येक जीव आध्यात्मिक स्फुलिंगमात्र है, अतःपरमेश्र्वर को जान पाना या देख पाना सम्भव नहीं है। भक्तरूप में अर्जुन को अपनी चिन्तनशक्ति पर भरोसा नहीं है, वह जीवात्मा होने के कारण अपनी सीमाओं को और कृष्ण की अकल्पनीय स्थिति को स्वीकार करता है। अर्जुन समझ चुका था कि क्षुद्र जीव के लिए असीम अनन्त को समझ पाना सम्भव नहीं है ।यदि अनन्त स्वयं प्रकट हो जाए,तो अनन्त की कृपासे ही उसकी प्रकृति को समझा जा सकता है। यहाँ पर योगेश्र्वर शब्द अत्यन्त सार्थक है, क्योंकि भगवान् के पास अचिन्त्य शक्ति है ।यदि वे चाहें तो असीम होकर भी अपने आपको प्रकट कर सकते हैं। अतः अर्जुन कृष्ण की अकल्पनीय कृपा की याचना करता है । वह कृष्ण को आदेश नहीं देता। जब तक कोई उनकी शरण में नहीं जाता और भक्ति नहीं करता, कृष्ण अपने को प्रकट करने के लिए बाध्य नहीं हैं। अतः जिन्हें अपनी चिन्तन शक्ति (मनोधर्म) का भरोसा है, वे कृष्णदर्शन नहीं कर पाते ।

श्रीभगवानुवाच
पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्त्रशः |
नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च || ५ ||

श्रीभगवान् उवाच -भगवान् कहा; पश्य – देखो; मे – मेरा; पार्थ – पृथापुत्र; रूपाणि- रूप;शतशः- सैकड़ों;अथ- भी;सहस्त्रशः- हजारों;नाना-विधानि- नाना रूप वाले; दिव्यानि – दिव्य; नाना – नाना प्रकार के; वर्ण – रंग; आकृतीनि – रूप; च – भी ।

भगवान् ने कहा –हे अर्जुन, हे पार्थ! अब तुम मेरे ऐश्र्वर्य को, सैकड़ों-हजारों प्रकार के दैवी तथा विविध रंगों वाले रूपों को देखो ।

तात्पर्य : अर्जुन कृष्ण के विश्र्वरूप का दर्शनाभिलाषी था, दिव्य होकर भी दृश्य जगत् के लाभार्थ प्रकट होता है । फलतः वह प्रकृति के अस्थाई काल द्वारा प्रभावित है । जिस प्रकार प्रकृति (माया) प्रकट-अप्रकट है, उसी प्रकार कृष्ण का यह विश्र्वरूप भी प्रकट तथा अप्रकट होता रहता है । यह कृष्ण रूपों की भाँति वैकुण्ठ में नित्य नहीं रहता । जहाँ तक भक्त की बात है, वह विश्र्व रूप देखने के लिए तनिक भी इच्छुक नहीं रहता, लेकिन चूँकि अर्जुन कृष्ण को इस रूप में देखना चाहता था, अतः वे यह रूप प्रकट करते हैं । सामान्य व्यक्ति इस रूप को नहीं देख सकता । श्रीकृष्ण द्वारा शक्ति प्रदान किये जाने पर ही इसके दर्शन हो सकते हैं ।

पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्र्विनौ मरुतस्तथा |
बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्र्चर्याणि भारत || ६ ||

पश्य – देखो; आदित्यान् – अदिति के बारहों पुत्रों को; वसून्- आठों वसुओं को; रुद्रान् – रूद्र के ग्यारह रूपों को; अश्र्विनौ- दो अश्र्विनी कुमारों को;मरुतः- उञ्चासों मरुतों को; तथा – भी;बहूनि- अनेक;अदृष्ट- देखे हुए; पूर्वाणि – पहले, इसके पूर्व, पश्य -देखो,आश्र्चर्याणि- समस्त आश्चर्यों को; भारत – हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ ।

हे भारत! लो, तुम आदित्यों, वसुओं, रुद्रों, अश्र्विनीकुमारों तथा अन्य देवताओं के विभिन्न रूपों को यहाँ देखो । तुम ऐसे अनेक आश्चर्यमय रूपों को देखो, जिन्हें पहले किसी ने न तो कभी देखा है, न सुना है ।

तात्पर्य : यद्यपि अर्जुन कृष्ण का अन्तरंग सखा तथा अत्यन्त विद्वान था, तो भी वह उनके विषय सबकुछ नहीं जानता था । यहाँ पर यह कहा गया है कि इन समस्त रूपों को न तो मनुष्यों ने इसके पूर्व देखा है, न सुना है । अब कृष्ण इन आश्चर्यमय रूपों को प्रकट कर रहे हैं ।

इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् |
मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद् द्रष्टुमिच्छसि || ७ ||

इह – इसमें; एक-स्थम् – एक स्थान में; जगत् – ब्रह्माण्ड; कृत्स्नम् – पूर्णतया; पश्य – देखो; अद्य – तुरन्त; स – सहित; चर – जंगम; अचरम् – तथा अचर, जड़;मम – मेरे; देहे – शरीर में; गुडाकेश – हे अर्जुन; यत् – जो; च – भी; अन्यत् – अन्य, और; द्रष्टुम् – देखना;इच्छसि – चाहते हो ।

हे अर्जुन! तुम जो भी देखना चाहो, उसेतत्क्षण मेरे इस शरीर में देखो । तुम इस समय तथा भविष्य में भी जो भी देखना चाहते हो, उसको यह विश्र्वरूप दिखाने वाला है । यहाँ एक ही स्थान पर चर-अचर सब कुछ है ।

तात्पर्य: कोई भी व्यक्ति एक स्थान में बैठे-बैठे सारा विश्र्व नहीं देख सकता । यहाँ तक कि बड़े से बड़ा वैज्ञानिक भी यह नहीं देख सकता कि ब्रह्माण्ड के अन्य भागों में क्या हो रहा है । किन्तु अर्जुन जैसा भक्त यह देख सकता है कि सारी वस्तुएँ जगत् में कहाँ-कहाँ स्थित हैं । कृष्ण उसे शक्ति प्रदान करते हैं, जिससे वह भूत, वर्तमान तथा भविष्य, जो कुछ देखना चाहे, देख सकता है । इस तरह अर्जुन कृष्ण के अनुग्रह से सारी वस्तुएँ देखने में समर्थ है ।

न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा |
दिव्यं ददामि ते चक्षु: पश्य मे योगमैश्र्वरम् || ८ ||

न – कभी नहीं; तु – लेकिन;माम् – मुझको; शक्यसे – तुम समर्थ होगे; द्रष्टुम् – देखने में; अनेन – इन; एव – निश्चय ही; स्व-चक्षुषा – अपनी आँखों से; दिव्यम् – दिव्य; ददामि – देता हूँ; ते – तुमको; चक्षुः – आँखें; पश्य – देखो; मे – मेरी; योगम् ऐश्र्वरम् – अचिन्त्य योगशक्ति ।

किन्तु तुम मुझे अपनी इन आँखों से नहीं देख सकते । अतः मैं तुम्हें दिव्य आँखें दे रहा हूँ । अब मेरे योग ऐश्र्वर्य को देखो ।

तात्पर्य : शुद्धभक्त कृष्ण को, उनके दोभुजी रूप केअतिरिक्त, अन्य किसी भी रूप में देखने की इच्छा नहीं करता । भक्त को भगवत्कृपा से ही उनके विराट रूप का दर्शन दिव्य चक्षुओं (नेत्रों) से करना होता है, न कि मन से । कृष्ण के विराट रूप का दर्शन करने के लिए अर्जुन से कहा जाता है कि वह अपने मन को नहीं, अपितु दृष्टि को बदले । कृष्ण का यह विराट रूप कोई महत्त्वपूर्ण नहीं है, यह बाद के श्लोकों से पता चल जाएगा । फिर भी, चूँकि अर्जुन इसका दर्शन करना चाहता था, अतः भगवान् ने उसे विराट रूप को देखने के लिए विशिष्ट दृष्टि प्रदान की ।

जो भक्त कृष्ण के साथ दिव्य सम्बन्ध से बँधे हैं, वे उनके ऐश्र्वर्यों के ईश्र्वरविहीन प्रदर्शनों से नहीं, अपितु उनके प्रेममय स्वरूपों से आकृष्ट होते हैं । कृष्ण के बालसंगी, कृष्ण सखा तथा कृष्ण के माता-पिता यह कभी नहीं चाहते कि कृष्ण उन्हें अपने ऐश्र्वर्यों का प्रदर्शन कराएँ । वे तो शुद्ध प्रेम में इतने निमग्न रहते हैं कि उन्हें पता ही नहीं चलता कि कृष्ण भगवान् हैं । वे प्रेम के आदान-प्रदान में इतने विभोर रहते हैं कि वे भूल जाते हैं कि श्रीकृष्ण परमेश्र्वर हैं । श्रीमद्भागवत में कहा गया है कि कृष्ण के साथ खेलने वाले बालक अत्यन्त पवित्र आत्माएँ हैं और कृष्ण के साथ इस प्रकार खेलने का अवसर उन्हें अनेकानेक जन्मों के बाद प्राप्त हुआ है | ऐसे बालक यह नहीं जानते कि कृष्ण भगवान् हैं | वे उन्हें अपना निजी मित्र मानते हैं | अतः शुकदेव गोस्वामी यह श्लोक सुनाते हैं –

इत्थं सतां ब्रह्म-सुखानुभूत्या
दास्यं गतानां परदैवतेन |
मायाश्रितानां नरदारकेण
साकं विजहुः कृत-पुण्य-पुञ्जाः ||

“यह वह परमपुरुष है, जिसे ऋषिगण निर्विशेष ब्रह्म करके मानते हैं, भक्तगण भगवान् मानते हैं और सामान्यजन प्रकृति से उत्पन्न हुआ मानते हैं | ये बालक, जिन्होंने अपने पूर्वजन्मों में अनेक पुण्य किये हैं, अब उसी भगवान् के साथ खेल रहे हैं |” (श्रीमद्भागवत १०.१२.११) |

तथ्य तो यह है की भक्त विश्र्वरूप को देखने का इच्छुक नहीं रहता, किन्तु अर्जुन कृष्ण के कथनों की पुष्टि करने के लिए विश्र्वरूप का दर्शन करना चाहता था, जिससे भविष्य में लोग यह समझ सकें की कृष्ण न केवल सैद्धान्तिक या दार्शनिक रूप से अर्जुन के समक्ष प्रकट हुए, अपितु साक्षात् रूप में प्रकट हुए थे | अर्जुन को इसकी पुष्टि करनी थी, क्योंकि अर्जुन से ही परम्परा-पद्धति प्रारम्भ होती है | जो लोग वास्तव में भगवान् को समझना चाहते हैं और अर्जुन के पदचिन्हों का अनुसरण करना चाहते हैं, उन्हें यह जान लेना चाहिए कि कृष्ण न केवल सैद्धान्तिक रूप में, अपितु वास्तव में अर्जुन के समक्ष परमेश्र्वर के रूप में प्रकट हुए |

भगवान् ने अर्जुन को अपना विश्र्वरूप देखने के लिए आवश्यक शक्ति प्रदान की, क्योंकि वे जानते थे की अर्जुन इस रूप को देखने के लिए विशेष इच्छुक न था, जैसा कि हम पहले बतला चुके हैं |

संजय उवाच
एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्र्वरो हरिः |
दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्र्वरम् || १ ||

सञ्जयःउवाच–संजय ने कहा; एवम्– इस प्रकार; उक्त्वा–कहकर; ततः–तत्पश्चात्; राजन्– हे राजा; महा-योग-ईश्र्वरः– परा शक्तिशाली योगी; हरिः– भगवान् कृष्ण ने; दर्शयाम् आस – दिखलाया; पार्थाय– अर्जुन को; परमम्– दिव्य; रूपमैश्र्वरम्– विश्र्वरूप |

संजय ने कहा – हे राजा! इस प्रकार कहकर महायोगेश्र्वर भगवान् ने अर्जुन को अपना विश्र्वरूप दिखलाया |

अनेकवक्त्रनयनमनेकाअद्भुतदर्शनम् |
अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम् || १० ||
दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् |
सर्वाश्र्चर्यमयं देवमनन्तं विश्र्वतोमुखम् || ११ ||

अनेक– कई; वक्त्र– मुख; नयनम्– नेत्र; अनेक– अनेक; अद्भुत– विचित्र; दर्शनम्– दृश्य; अनेक– अनेक; दिव्य– दिव्य,अलौकिक; आभरणम्– आभूषण; दिव्य– दैवी; अनेक– विविध; उद्यत– उठाये हुए; आयुधम्– हथियार; दिव्य– दिव्य; माल्य– मालाएँ; अम्बर– वस्त्र; धरम्– धारण किये; दिव्य– दिव्य; गन्ध– सुगन्धियाँ; अनुलेपनम्– लगी थीं; सर्व– समस्त; आश्र्चर्य-मयम्– आश्चर्यपूर्ण; देवम्– प्रकाशयुक्त; अनन्तम्– असीम; विश्र्वतः-मुखम्– सर्वव्यापी |

अर्जुन ने इस विश्र्वरूप में असंख्य मुख, असंख्य नेत्र तथा असंख्य आश्चर्यमय दृश्य देखे | यह रूप अनेक दैवी आभूषणों से अलंकृत था और अनेक दैवी हथियार उठाये हुए था | यह दैवी मालाएँ तथा वस्त्र धारण किये थे और उस पर अनेक दिव्य सुगन्धियाँ लगी थीं | सब कुछ आश्चर्यमय, तेजमय, असीम तथा सर्वत्र व्याप्त था |

तात्पर्य: इस दोनों श्लोकों में अनेक शब्द बारम्बार प्रयोग हुआ है, जो यह सूचित करता है की अर्जुन जिस रूप को देख रहा था उसके हाथों, मुखों, पाँवों की कोई सीमा ण थी | ये रूप सारे ब्रह्माण्ड में फैले हुए थे, किन्तु भगवत्कृपा से अर्जुन उन्हें एक स्थान पर बैठे-बैठे देख रहा था | यह सब कृष्ण की अचिन्त्य शक्ति के कारण था |

दिवि सूर्यसहस्त्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता |
यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः || १२ ||

दिवि– आकाश में; सूर्य– सूर्य का;सहस्त्रस्य– हजारों; भवेत्– थे; युगपत्– एकसाथ; उत्थिता– उपस्थित; यदि– यदि; भाः– प्रकाश; सदृशी– के समान; सा– वह;स्यात्– हो;भासः– तेज; तस्य– उस; महात्मनः– परम स्वामी का |

यदि आकाश में हजारों सूर्य एकसाथ उदय हों, तो उनका प्रकाश शायद परमपुरुष के इस विश्र्वरूप के तेज की समता कर सके |

तात्पर्य : अर्जुन ने जो कुछ देखा वह अकथ्य था, तो भी संजय धृतराष्ट्र को उस महान दर्शन का मानसिक चित्र उपस्थित करने का प्रयत्न कर रहा है | न तो संजय वहाँ था, न धृतराष्ट्र, किन्तु व्यासदेव के अनुग्रह से संजय सारी घटनाओं को देख सकता है | अतएव इस स्थिति की तुलना वह एक काल्पनिक घटना (हजारों सूर्यों) से कर रहा है, जिससे इसे समझा जा सके |

तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा |
अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा || १३ ||

तत्र– वहाँ; एक-स्थम्– एकत्र, एक स्थान में; जगत्– ब्रह्माण्ड;कृत्स्नम्– सम्पूर्ण;प्रविभक्तम्– विभाजित; अनेकधा– अनेक में; अपश्यत्– देखा;देव-देवस्य– भगवान् के; शरीरे– विश्र्वरूप में; पाण्डवः– अर्जुन ने; तदा– तब |

उस समय अर्जुन भगवान् के विश्र्वरूप में एक ही स्थान पर स्थित हजारोंभागों में विभक्त ब्रह्माण्ड के अनन्त अंशों को देख सका |

तात्पर्य :तत्र (वहाँ) शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है | इससे सूचितहोता है कि जब अर्जुन ने विश्र्वरूप देखा, उस समय अर्जुन तथा कृष्ण दोनों ही रथ परबैठे थे | युद्धभूमि के अन्य लोग इस रूप को नहीं देख सके, क्योंकि कृष्ण ने केवलअर्जुन को दृष्टि प्रदान की थी | वह कृष्ण के शरीर में हजारों लोक देख सका | जैसाकि वैदिक शास्त्रों से पता चलता है कि ब्रह्माण्ड अनेक हैं और लोक भी अनेक हैं |इनमें से कुछ मिट्टी के बने हैं, कुछ सोने के, कुछ रत्नों के, कुछ बहुत बड़े हैं,तो कुछ बहुत बड़े नहीं हैं | अपने रथ पर बैठकर अर्जुन इन सबों को देख सकता था |किन्तु कोई यह नहीं जान पाया कि अर्जुन तथा कृष्ण के बीच क्या चल रहा था |

ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः |
प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत || १४ ||

ततः– तत्पश्चात्; सः– वह; विस्मय-आविष्टः – आश्चर्यचकित होकर; हृष्ट-रोमा– हर्ष से रोमांचित; धनञ्जयः– अर्जुन; प्रणम्य– प्रणाम करके; शिरसा– शिर के बल; देवम्– भगवान् को; कृत-अञ्जलिः– हाथ जोड़कर; अभाषत– कहने लगा |

तब मोहग्रस्त एवं आश्चर्यचकित रोमांचित हुए अर्जुन ने प्रणाम करने के लिए मस्तक झुकाया और वह हाथ जोड़कर भगवान् से प्रार्थना करने लगा |

तात्पर्य: एक बार दिव्य दर्शन हुआ नहीं कि कृष्ण तथा अर्जुन के पारस्परिक सम्बन्ध तुरन्त बदल गये | अभी तक कृष्ण तथा अर्जुन में मैत्री सम्बन्ध था, किन्तु दर्शन होते ही अर्जुन अत्यन्त आदरपूर्वक प्रणाम कर रहा है और हाथ जोड़कर कृष्ण से प्रार्थना कर रहा है | वह उनके विश्र्वरूप की प्रशंसा कर रहा है | इस प्रकार अर्जुन का सम्बन्ध मित्रता का न रहकर आश्चर्य का बन जाता है | बड़े-बड़े भक्त कृष्ण को समस्त सम्बन्धों का आगार मानते हैं | शास्त्रों में १२ प्रकार के सम्बन्धों का उल्लेख है और वे सब कृष्ण में निहित हैं | यह कहा जाता है कि वे दो जीवों के बीच, देवताओं के बीच या भगवान् तथा भक्त के बीच के पारस्परिक आदान-प्रदान होने वाले सम्बन्धों के सागर हैं |

यहाँ पर अर्जुन आश्चर्य-सम्बन्ध से प्रेरित है और उसीमें वह अत्यन्त गम्भीर तथा शान्त होते हुए भी अत्यन्त आह्दालित हो उठा | उसके रोम खड़े हो गये और वह हाथ जोड़कर भगवान् की प्रार्थना करने लगा | निस्सन्देह वह भयभीत नहीं था | वह भगवान् के आश्चर्यों से अभिभूत था | इस समय तो उसके समक्ष आश्चर्य था और उसकी प्रेमपूर्ण मित्रता आश्चर्य से अभिभूत थी | अतः उसकी प्रतिक्रिया इस प्रकार हुई |

अर्जुन उवाच
पश्यामि देवांस्तव देव देहे
सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान् |
ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थ-
मृषींश्र्च सर्वानुरगांश्र्च दिव्यान् || १५ ||

अर्जुनः उवाच– अर्जुन ने कहा; पश्यामि– देखता हूँ; देवान्– समस्त देवताओं को; तव– आपके; देव- हे प्रभु; देहे– शरीर में; सर्वान्– समस्त; तथा– भी; भूत– जीव; विशेष-सङघान्– विशेष रूप से एकत्रित; ब्रह्माणम्– ब्रह्मा को; ईशम्– शिव को; कमल-आसन-स्थम्– कमल के ऊपर आसीन; ऋषीन्– ऋषियों को; च– भी; सर्वान्– समस्त; उरगान्– सर्पों को; च– भी; दिव्यान्– दिव्य |

अर्जुन ने कहा – हे भगवान् कृष्ण! मैं आपके शरीर में सारे देवताओं तथा अन्य विविध जीवों को एकत्र देख रहा हूँ | मैं कमल पर आसीन ब्रह्मा, शिवजी तथा समस्त ऋषियों एवं दिव्य सर्पों को देख रहा हूँ |

तात्पर्य : अर्जुन ब्रह्माण्ड कि प्रत्येक वास्तु देखता है, अतः वह ब्रह्माण्ड के प्रथम प्राणी ब्रह्मा को तथा उस दिव्य सर्प को, जिस पर गर्भोदकशायी विष्णु ब्रह्माण्ड के अधोतल में शयन करते हैं, देखता है | इस शेष-शय्या के नाग को वासुकि भी कहते हैं | अन्य सर्पों को भी वासुकि कहा जाता है | अर्जुन गर्भोदकशायी विष्णु से लेकर कमललोक स्थित ब्रह्माण्ड के शीर्षस्य भाग को जहाँ ब्रह्माण्ड के प्रथम जीव ब्रह्मा निवास करते हैं, देख सकता है | इसका अर्थ यह है कि अर्जुन आदि से अन्त तक की सारी वस्तुएँ अपने रथ में एक ही स्थान पर बैठे-बैठे देख सकता था | यह सब भगवान् कृष्ण की कृपा से ही सम्भव हो सका |

अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं
पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् |
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं
पश्यामि विश्र्वेश्र्वर विश्र्वरूप || १६ ||

अनेक– कई; बाहु– भुजाएँ; उदार– पेट; वक्त्र– मुख; नेत्रम्–आँखें; पश्यामि– देख रहा हूँ; त्वाम्– आपको; सर्वतः– चारों ओर; अनन्त-रूपम्– असंख्य रूप; न अन्तम्– अन्तहीन, कोई अन्त नहीं है; न मध्यम् – मध्य रहित; न पुनः– न फिर; तव– आपका; आदिम्– प्रारम्भ; पश्यामि– देखता हूँ; विश्र्व-ईश्र्वर– हे ब्रह्माण्ड के स्वामी; विश्र्वरूप– ब्रह्माण्ड के रूप में |

हे विश्र्वेश्र्वर, हे विश्र्वरूप! मैं आपके शरीर में अनेकानेक हाथ, पेट, मुँह तथा आँखें देख रहा हूँ, जो सर्वत्र फैले हैं और जिनका अन्त नहीं है | आपमें न अन्त दीखता है, न मध्य और न आदि |

तात्पर्य: कृष्ण भगवान् हैं और असीम हैं, अतः उनके माध्यम से सब कुछ देखा जा सकता था |

किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च
तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् |
पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ता-
द्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् || १७ ||

किरीटिनम् – मुकुट युक्त;गदिनम् – गदा धारण किये; चक्रिणम् – चक्र समेत;च – तथा;तेजःराशिम् – तेज;सर्वतः – चारों ओर;दीप्ति-मन्तम् – प्रकाश युक्त;पश्यामि – देखता हूँ;त्वाम् – आपको;दुर्निरीक्ष्यम् – देखने में कठिन;समन्तात् – सर्वत्र;दीप्त-अनल – प्रज्जवलित अग्नि;अर्क – सूर्य की;द्युतिम् – धूप;अप्रमेयम् – अनन्त |

आपके रूप को उसके चकाचौंध के कारण देख पाना कठिन है, क्योंकि वह प्रज्जवलित अग्नि कि भाँति अथवा सूर्य के अपार प्रकाश की भाँति चारों ओर फैल रहा है | तो भी मैं इस तेजोमय रूप को सर्वत्र देख रहा हूँ, जो अनेक मुकुटों, गदाओं तथा चक्रों से विभूषित है |

त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं
त्वमस्य विश्र्वस्य परं निधानम् |
त्वमव्ययः शाश्र्वतधर्मगोप्ता
सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे || १८ ||

त्वम् – आप;अक्षरम् – अच्युत;परमम् – परम;वेदितव्यम् – जानने योग्य;त्वम् – आप;अस्य – इस;विश्र्वस्य – विश्र्व के;परम् – परम;निधानम् – आधार;त्वम् – आप;अव्ययः – अविनाशी;शाश्र्वत-धर्म-गोप्ता – शाश्र्वत धर्म के पालक;सनातनः – शाश्र्वत;त्वम् – आप;पुरुषः – परमपुरुष;मतः मे – मेरा मत है|

आप परम आद्य ज्ञेय वास्तु हैं | आप इस ब्रह्माण्ड के परम आधार (आश्रय) हैं | आप अव्यय तथा पुराण पुरुष हैं | आप सनातन धर्म के पालक भगवान् हैं | यही मेरा मत है |

अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्य-
मनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् |
पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं
स्वतेजसा विश्र्वमिदं तपन्तम् || १९ ||

अनादि– आदिरहित; मध्य– मध्य; अन्तम्– या अन्त; अनन्त– असीम;वीर्यम्– महिमा; अनन्त– असंख्य; बाहुम्– भुजाएँ; शशि– चन्द्रमा; सूर्य– तथासूर्य; नेत्रम्– आँखें; पश्यामि– देखता हूँ; त्वाम्– आपको; दीप्त– प्रज्जवलित;हुताश-वक्त्रम्– आपके मुख से निकलती अग्नि को;स्व-तेजसा – अपने तेज से;विश्र्वम्– विश्र्व को; इदम्– इस; तपन्तम्– तपाते हुए |

आप आदि, मध्य तथा अन्त से रहित हैं | आपका यश अनन्त है | आपकी असंख्यभुजाएँ हैं और सूर्य चन्द्रमा आपकी आँखें हैं | मैं आपके मुख से प्रज्जवलित अग्निनिकलते और आपके तेज से इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को जलाते हुए देख रहा हूँ |

तात्पर्य : भगवान् के षड्ऐश्र्वर्यों की कोई सीमा नहीं है | यहाँ परतथा अन्यत्र भी पुनरुक्ति पाई जाती है, किन्तु शास्त्रों के अनुसार कृष्ण की महिमाकी पुनरुक्ति कोई साहित्यिक दोष नहीं है | कहा जाता है कि मोहग्रस्त होने या परमआह्लाद के समय या आश्चर्य होने पर कथनों की पुनरुक्ति हुआ करती है | यह कोई दोष नहीं है |

द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि
व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्र्च सर्वाः |
दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं
लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् || २० ||

द्यौ– बाह्य आकाश से लेकर; आ-पृथिव्योः– पृथ्वी तक; इदम्– इस; अन्तरम्– मध्य में; हि– निश्चय ही; व्याप्तम्– व्याप्त; त्वया– आपके द्वारा; एकेन– अकेला; दिशः– दिशाएँ; च– तथा; सर्वाः– सभी;दृष्ट्वा– देखकर; अद्भुतम्– अद्भुत; रूपम्– रूप को; उग्रम्– भयानक; तव– आपके; इदम्– इस; लोक– लोक; त्रयम्– तीन; प्रव्यथितम्– भयभीत, विचलित; महा-आत्मन्– हे महापुरुष |

यद्यपि आप एक हैं, किन्तु आप आकाश तथा सारे लोकों एवं उनके बीच के समस्त अवकाश में व्याप्त हैं | हे महापुरुष! आपके इस अद्भुत तथा भयानक रूप को देखके सारे लोक भयभीत हैं |

तात्पर्य: इस श्लोक में द्याव्-आ-पृथिव्योः (धरती तथा आकाश के बीच का स्थान) तथा लोकत्रयम् (तीनों संसार) महत्त्वपूर्ण शब्द हैं, क्योंकि ऐसा लगता है कि न केवल अर्जुन ने इस विश्र्वरूप को देखा, बल्कि अन्य लोकों के वासियों ने भी देखा | अर्जुन द्वारा विश्र्वरूप का दर्शन स्वप्न न था | भगवान् ने जिन जिनको दिव्य दृष्टि प्रदान की, उन्होंने युद्धक्षेत्र में उस विश्र्वरूप को देखा |

अमी हि त्वां सुरसङघा विशन्ति
केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति |
स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङघाः
स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः || २१ ||

अमी– वे सब; हि– निश्चय ही; त्वाम्– आपको; सुर-सङघाः– देव समूह;विशन्ति– प्रवेश कर रहे हैं; केचित्– उनमें से कुछ; भीताः– भयवश; प्राञ्जलयः–हाथ जोड़े; गृणन्ति– स्तुति कर रहे हैं; स्वस्ति– कल्याण हो; इति– इस प्रकार;महा-ऋषि– महर्षिगण; सिद्ध-सङ्घाः– सिद्ध लोग; स्तुवन्ति– स्तुति कर रहे हैं;त्वाम्– आपकी; स्तुतिभिः– प्रार्थनाओं से; पुष्कलाभिः– वैदिक स्तोत्रों से |

देवों का सारा समूह आपकी शरण ले रहा है और आपमें प्रवेश कर रहा है |उनमें से कुछ अत्यन्त भयभीत होकर हाथ जोड़े आपकी प्रार्थना कर रहें हैं | महर्षियोंतथा सिद्धों के समूह “कल्याण हो” कहकर वैदिक स्तोत्रों का पाठ करते हुए आपकीस्तुति कर रहे हैं |

तात्पर्य : समस्त लोकों के देवता विश्र्वरूप कीभयानकता तथा प्रदीप्ततेज से इतने भयभीत थे कि वे रक्षा के लिए प्रार्थना करने लगे |

रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या
विश्र्वऽश्र्विनौ मरुतश्र्चोष्मपाश्र्च |
गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङघा
वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्र्चैव सर्वे || २२ ||

रूद्र– शिव का रूप; आदित्याः– आदित्यगण; वसवः– सारेवसु; ये– जो; च– तथा; साध्याः– साध्य; विश्र्वे– विश्र्वेदेवता; अश्र्विनौ–अश्र्विनीकुमार; मरुतः– मरुद्गण; च– तथा; उष्ण-पाः– पितर; च– तथा; गन्धर्व–गन्धर्व; यक्ष– यक्ष; असुर– असुर; सिद्ध– तथा सिद्ध देवताओं के; सङ्घाः– समूह;वीक्षन्ते– देख रहे हैं; त्वाम्– आपको;विस्मिताः– आश्चर्यचकित होकर; च– भी;एव– निश्चय ही; सर्वे– सब |

शिव के विविध रूप, आदित्यगण, वसु, साध्य, विश्र्वेदेव, दोनोंअश्र्विनीकुमार, मरुद्गण, पितृगण, गन्धर्व, यक्ष, असुर तथा सिद्धदेव सभी आपकोआश्चर्यपूर्वक देख रहे हैं |

रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं
महाबाहो बहुबाहूरूपादम् |
बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं
दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम् || २३ ||


रूपम्– रूप; महत्– विशाल; ते– आपका;बहु– अनेक; वक्त्र– मुख; नेत्रम्– तथा आँखें; महा-बाहों – हे बलिष्ट भुजाओं वाले; बहु– अनेक; बाहु– भुजाएँ; उरु– जाँघें; पादम्– तथा पाँव; बहु-उदरम्– अनेक पेट; बहु-दंष्ट्रा– अनेक दाँत; करालम्– भयानक ; दृष्ट्वा– देखकर; लोकाः– सारे लोक; प्रव्यथिताः– विचलित; तथा– उसी प्रकार; अहम्– मैं |

हे महाबाहु! आपके इस अनेक मुख, नेत्र, बाहु,जांघ, पाँव, पेट तथा भयानक दाँतों वाले विराट रूप को देखकर देवतागण सहित सभी लोक अत्यन्तविचलित हैं और उन्हीं की तरह मैं भी हूँ |

नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं
व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् |
दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा
धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो || २४ ||

नभः-स्पृशम्– आकाश छूता हुआ; दीप्तम्– ज्योर्तिमय; अनेक– कई; वर्णम्– रंग; व्याक्त– खुले हुए; आननम्– मुख; दीप्त– प्रदीप्त; विशाल– बड़ी-बड़ी; नेत्रम्– आँखें; दृष्ट्वा– देखकर; हि– निश्चय ही; त्वाम्– आपको; प्रव्यथितः– विचलित, भयभीत; अन्तः– भीतर; आत्मा– आत्मा; धृतिम्– दृढ़ता या धैर्य को; न– नहीं; विन्दामि– प्राप्त हूँ; शमम्– मानसिक शान्ति को; च– भी; विष्णो– हे विष्णु |

हे सर्वव्यापी विष्णु!नाना ज्योर्तिमय रंगोंसे युक्त आपको आकाश का स्पर्श करते, मुख फैलाये तथा बड़ी-बड़ी चमकती आँखें निकालेदेखकर भय से मेरा मन विचलित है | मैं न तो धैर्य धारण कर पा रहा हूँ, न मानसिकसंतुलन ही पा रहा हूँ |

दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि
दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि |
दिशो न जाने न लभे च शर्म
प्रसीद देवेश जगन्निवास || २५ ||

दंष्ट्रा– दाँत; करालानि– विकराल; च– भी; ते – आपके; मुखानि– मुखों को; दृष्ट्वा– देखकर; एव– इस प्रकार; काल-अनल– प्रलय की; सन्नि-भानि– मानो; दिशः– दिशाएँ;न– नहीं;जाने– जानता हूँ; न– नहीं; लभे– प्राप्त करता हूँ; च– तथा; शर्म– आनन्द; प्रसीद– प्रसन्न हों; देव-ईश– हे देवताओं के स्वामी; जगत्-निवास– हे समस्त जगतों के आश्रय |

हे देवेश! हे जगन्निवास! आप मुझ पर प्रसन्नहों ! मैं इस प्रकार से आपके प्रल्याग्नि स्वरूप मुखों को तथा विकराल दाँतों कोदेखकर अपना सन्तुलन नहीं रख पा रहा | मैं सब ओर से मोहग्रस्त हो रहा हूँ |

अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः
सर्वे सहैवावनिपालसङ्घै |
भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ
सहास्मदियैरपि योधमुख्यै: || २६ ||
वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति
दंष्ट्राकरालानि भयानकानि |
केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु
सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरूत्तमाङ्गै: || २७ ||

अमी– ये; च– भी; त्वाम्– आपको; धृतराष्ट्रस्य– धृतराष्ट्र के;पुत्राः– पुत्र; सर्वे– सभी;सह– सहित; एव– निस्सन्देह; अवनि-पाल– वीर राजाओंके; सङ्घै– समूह; भीष्मः– भीष्मदेव; द्रोणः– द्रोणाचार्य; सूत-पुत्रः– कर्ण;तथा– भी; असौ– यह; सह– साथ; अस्मदीयैः– हमारे; अपि– भी; योध-मुख्यैः– मुख्ययोद्धा; वक्त्राणि– मुखों में;ते– आपके;त्वरमाणाः– तेजीसे; विशन्ति– प्रवेश कर रहे हैं; दंष्ट्रा– दाँत; करालानि– विकराल; भयानकानि–भयानक; केचित्– उनमें से कुछ; विलग्नाः– लगे रहकर; दशन-अन्तरेषु– दाँतों केबीच में; सन्दृश्यन्ते– दिख रहे हैं; चूर्णितैः– चूर्ण हुए; उत्तम-अङगैः– शिरोंसे |

धृतराष्ट्र के सारे पुत्र अपने समस्त सहायकराजाओं सहित तथा भीष्म, द्रोण, कर्ण एवं हमारे प्रमुख योद्धा भी आपके विकराल मुखमें प्रवेश कर रहे हैं | उनमें से कुछ के शिरों को तो मैं आपके दाँतों के बीचचूर्णित हुआ देख रहा हूँ |

तात्पर्य: एक पिछले श्लोक में भगवान् ने अर्जुन को वचन दिया था कि यदि वह कुछ देखने इच्छुक हो तो वे उसे दिखा सकते हैं |अब अर्जुन देख रहा है कि विपक्ष के नेता (भीष्म, द्रोण, कर्ण तथा धृतराष्ट्र के सारे पुत्र) तथा उनके सैनिक और अर्जुन के भी सैनिक विनष्ट हो रहे हैं | यह इसका संकेत है कि कुरुक्षेत्र में एकत्र समस्त व्यक्तियों की मृत्यु के बाद अर्जुनविजयी होगा | यहाँ यह भी उल्लेख है कि भीष्म भी, जिन्हें अजेय माना जाता है,ध्वस्त हो जायेंगे | वही गति कर्ण की होनी है | न केवल विपक्ष केभीष्म जैसे महानयोद्धा विनष्ट हो जाएँगे, अपितु अर्जुन के पक्ष वाले कुछ महान योद्धा भी नष्टहोंगे |

यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः
समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति |
तथा तवामी नरलोकवीरा
विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति || २८ ||

यथा– जिस प्रकार; नदीनाम्– नदियों की;बहवः– अनेक; अम्बु-वेगाः–जल कीतरंगें; समुद्रम्– समुद्र; एव– निश्चय ही; अभिमुखाः– की ओर; द्रवन्ति –दौड़ती हैं; तथा– उसी प्रकार से; तव– आपके; अभी– ये सब; नर-लोक-वीराः – मानवसमाज के राजा; विशन्ति– प्रवेश कर रहे हैं; वक्त्राणि– मुखों में; अभिविज्वलन्ति– प्रज्जवलित हो रहे हैं |

जिस प्रकार नदियों की अनेक तरंगें समुद्रमें प्रवेश करती हैं, उसीप्रकार ये समस्त महान योद्धा भी आपके प्रज्जवलितमुखों में प्रवेश कर रहे हैं |

यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा
विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः |
तथैव नाशाय विशन्ति लोका-
स्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः || २९ ||

यथा– जिस प्रकार; प्रदीप्तम्– जलती हुई;ज्वलनम्– अग्नि में; पतङगाः– पतिंगे, कीड़े मकोड़े; विशन्ति– प्रवेश करते हैं; नाशाय– विनाश के लिए; समृद्ध– पूर्ण; वेगाः– वेग; तथा एव– उसी प्रकार से; नाशाय– विनाश के लिए; विशन्ति– प्रवेश कररहे हैं; लोकाः– सारे लोग; एव– आपके; अपि– भी; वक्त्राणि– मुखों में; समृद्ध-वेगाः– पूरे वेग से |

मैं समस्त लोगों को पूर्ण वेग सेआपके मुख में उसी प्रकार प्रविष्टहोते देख रहा हूँ, जिस प्रकार पतिंगे अपनेविनाश के लिए प्रज्जवलित अग्नि में कूदपड़ते हैं |

लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ता-
ल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः |
तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं
भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो || ३० ||

लेलिह्यसे– चाट रहे हैं; ग्रसमानः – निगलते हुए; समन्तात्– समस्त दिशाओं से; लोकान्– लोगों को; समग्रान्– सभी; वदनैः– मुखों से; ज्वलद्भिः– जलते हुए; तेजोभिः– तेज से; आपूर्य– आच्छादित करके; जगत्– ब्रह्माण्ड को;समग्रम्– समस्त; भासः– किरणें; तव – आपकी; उग्राः– भयंकर; प्रतपन्ति– झुलसा रही हैं; विष्णो– हेविश्र्वव्यापी भगवान् |

हे विष्णु!मैं देखता हूँ कि आप अपने प्रज्जवलित मुखों से सभी दिशाओं के लोगों को निगलरहे हैं | आप सारे ब्रह्माण्ड को अपने तेज से आपूरित करके अपनीविकरालझुलसाती किरणों सहित प्रकट हो रहे हैं |

आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो
नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद |
विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं
न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् || ३१ ||

आख्याहि– कृपया बताएँ; मे– मुझको; कः– कौन; भवान्– आप; उग्र-रूपः– भयानक रूप; नमः-अस्तु– नमस्कार हो; ते– आपको; देव-वर– हे देवताओं में श्रेष्ठ; प्रसीद– प्रसन्न हों; विज्ञातुम्– जानने के लिए; इच्छामि– इच्छुक हूँ; भवन्तम्– आपको; आद्यम्– आदि; न– नहीं;हि– निश्चय ही; प्रजानामि– जानता हूँ; तव– आपका; प्रवृत्तिम्– प्रयोजन |

हे देवेश!कृपा करकेमुझे बतलाइये कि इतने उग्ररूप में आप कौन हैं? मैं आपको नमस्कार करता हूँ, कृपा करके मुझ पर प्रसन्न हों | आप आदि-भगवान् हैं | मैं आपको जानना चाहताहूँ, क्योंकि मैं नहीं जान पा रहा हूँ कि आपका प्रयोजन क्या है |

श्रीभगवानुवाच
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो
लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः |
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे
येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः || ३२ ||

श्रीभगवान् उवाच – भगवान् ने कहा; कालः – काल; अस्मि – हूँ; लोक – लोकोंका; क्षय-कृत – नाश करने वाला; प्रवृद्धः – महान; लोकान् – समस्त लोगों को; समाहर्तुम् – नष्ट करने में;इह– इस संसार में;प्रवृत्तः – लगा हुआ; ऋते – बिना; अपि – भी; त्वाम् – आपको; न – कभी नहीं; भविष्यन्ति – होंगे; सर्वे – सभी; ये – जो; अवस्थिताः – स्थित; प्रति-अनीकेषु – विपक्ष में; योधाः – सैनिक ।

भगवान् ने कहा – समस्त जगतों को विनष्ट करने वाला काल मैं हूँ और मैं यहाँ समस्त लोगों का विनाश करने के लिए आया हूँ । तुम्हारे (पाण्डवों के) सिवा दोनों पक्षों के सारे योद्धा मारे जाएँगे ।

तात्पर्य :यद्यपि अर्जुन जानता था कि कृष्ण उसके मित्र तथा भगवान् हैं, तो भी वहकृष्ण के विविध रूपों को देखकर चकित था । इसलिए उसने इस विनाशकारी शक्ति के उद्देश्य के बारे में पूछताछ की । वेदों में लिखा है कि परम सत्य हरवस्तु को, यहाँ तक कि ब्राह्मणों को भी, नष्ट कर देते हैं । कठोपनिषद् का (१.२.२५) वचन है –

यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च उभे भवत ओदनः ।
मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः ॥

अन्ततः सारे ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा अन्य सभी परमेश्र्वर द्वारा काल-कवलितहोते हैं । परमेश्र्वर का यह रूप सबका भक्षण करने वाला है और यहाँ परकृष्ण अपने को सर्वभक्षी काल के रूप में प्रस्तुत करते हैं । केवल कुछपाण्डवों के अतिरिक्त युद्धभूमि में आये सभी लोग उनके द्वारा भक्षित होंगे ।

अर्जुन लड़ने के पक्ष में न था, वह युद्ध न करना श्रेयस्करसमझता था, क्योंकि तब किसी प्रकार की निराशा न होती । किन्तु भगवान् काउत्तर है कि यदि वह नहीं लड़ता, तो भी सारे लोग उनके ग्रास बनते, क्योंकियही उनकी इच्छा है । यदि अर्जुन नहीं लड़ता, तो वे सब अन्य विधि से मरते ।मृत्यु रोकी नहीं जा सकती, चाहे वह लड़े या नहीं । वस्तुतः वे पहले से मृतहैं । काल विनाश है और परमेश्र्वर की इच्छानुसार सारे संसार को विनष्ट होनाहै । यह प्रकृति का नियम है ।

तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व
जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् |
मयैवैते निहताः पूर्वमेव
निमित्तमात्रं भाव सव्यसाचिन् || ३३ ||

तस्मात्– अतएव; त्वम्–तुम; उत्तिष्ट– उठो; यशः– यश; लभस्व– प्राप्तकरो; जित्वा– जीतकर; शत्रून्–शत्रुओं को; भुङ्क्ष्व– भोग करो; राज्यम्– राज्य का; समृद्धम्– सम्पन्न;मया–मेरे द्वारा; एव– निश्चय ही; एते– ये सब; निहताः– मारे गये;पूर्वम् एव– पहलेही; निमित्त-मात्रम्– केवलकारण मात्र; भव– बनो; सव्य-साचिन्– हे सव्यसाची |

अतःउठो! लड़ने के लिएतैयार होओ और यश अर्जित करो | अपने शत्रुओं को जीतकरसम्पन्न राज्य का भोग करो |ये सब मेरे द्वारा पहले ही मारे जा चुके हैं औरहे सव्यसाची! तुम तो युद्ध मेंकेवल निमित्तमात्र हो सकते हो |

तात्पर्य:सव्यसाची काअर्थ है वह जो युद्धभूमि में अत्यन्त कौशल के साथतीर छोड़ सके | इस प्रकार अर्जुनको एक पटु योद्धा के रूप में सम्बोधित कियागया है, जो अपने शत्रुओं को तीर सेमारकर मौत के घाट उतार सकता है | निमित्तमात्रम्– “केवल कारण मात्र” यह शब्द भीअत्यन्त महत्त्वपूर्ण है | संसार भगवान् की इच्छानुसार गतिमान है | अल्पज्ञ पुरुषसोचते हैं कि प्रकृतिबिना किसी योजना के गतिशील है और सारी सृष्टि आकस्मिक है |ऐसा अनेकतथाकथित विज्ञानी हैं, जो यह सुझाव रखते हैं कि सम्भवतया ऐसा था, या ऐसा होसकता है, किन्तु इस प्रकार के “शायद” या “हो सकता है” का प्रश्न ही नहींउठता | प्रकृति द्वारा विशेष योजना संचालित की जा रही है | यह योजना क्याहै? यह विराट जगत् बद्धजीवों के लिए भगवान् के धाम वापस जाने के लिएसुअवसर (सुयोग) है | जब तकउनकी प्रवृत्ति प्रकृति के ऊपर प्रभुत्व स्थापितकरने की रहती है, तब तक वे बद्धरहते हैं | किन्तु जो कोई भी परमेश्र्वर कीइस योजना (इच्छा) को समझ लेता है औरकृष्णभावनामृत का अनुशीलन करता है, वहपरम बुद्धिमान है | दृश्यजगत की उत्पत्तितथा उसका संहार ईश्र्वर की परमअध्यक्षता में होता है | इस प्रकार कुरुक्षेत्र कायुद्ध ईश्र्वर की योजनाके अनुसार लड़ा गया | अर्जुन युद्ध करने से मना कर रहा था,किन्तु उसे बतायागया कि परमेश्र्वर की इच्छानुसार उसे लड़ना होगा | तभी वह सुखीहोगा | यदिकोई कृष्णभावनामृत से पूरित हो और उसका जीवन भगवान् की दिव्य सेवा मेंअर्पित हो, तो समझो कि वह कृतार्थ है |

द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च
कर्णं तथान्यानपि योधवीरान् |
मया हतांस्तवं जहि माव्यथिष्ठा
युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान् || ३४ ||

द्रोणम् च– तथा द्रोण; भीष्मम्– भीष्म भी; जयद्रथम् च– तथाजयद्रथ;कर्णम्– कर्ण; तथा– और; अन्यान्– अन्य; अपि– निश्चय ही; योध-वीरान्– महानयोद्धा; मया– मेरे द्वारा; हतान्– पहले ही मारे गये; त्वम्– तुम; जहि– मारो;मा– मत; व्यथिष्ठाः– विचलित होओ; युध्यस्व– लड़ो; जेता असि– जीतोगे;रणे–युद्ध में; सपत्नान्– शत्रुओं को |

द्रोण, भीष्म, जयद्रथ, कर्ण तथा अन्य महान योद्धा पहले ही मेरे द्वारामारेजा चुके हैं | अतः उनका वध करो और तनिक भी विचलित न होओ | तुम केवल युद्ध करो| युद्ध में तुम अपने शत्रुओं को परास्त करोगे |

तात्पर्य : प्रत्येक योजना भगवान् द्वारा बनती है, किन्तु वे अपनेभक्तों परइतने कृपालु रहते हैं कि जो भक्त उनकी इच्छानुसार उनकी योजना का पालनकरतेहैं, उन्हें ही वे उसका श्रेय देते हैं | अतः जीवन को इस प्रकार गतिशीलहोनाचाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति कृष्णभावनामृत में कर्म करे और गुरु केमाध्यम सेभगवान् को जाने | भगवान् की योजनाएँ उन्हीं की कृपा से समझी जातीहैं और भक्तों कीयोजनाएँ उनकी ही योजनाएँ हैं | मनुष्य को चाहिए कि ऐसीयोजनाओं का अनुसरण करे औरजीवन-संघर्ष में विजयी बने |

सञ्जय उवाच |
एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य
कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीती |
नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं
सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य || ३५ ||

सञ्जयः उवाच– संजय ने कहा; एतत्– इस प्रकार; श्रुत्वा– सुनकर;वचनम्– वाणी; केशवस्य– कृष्ण की; कृत-अञ्जलिः– हाथ जोड़कर; वेपमानः– काँपतेहुए; किरीटी– अर्जुन ने; नमस्कृत्वा– नमस्कार करके; भूयः– फिर; एव– भी; आह –बोला; कृष्णम्– कृष्ण से; स-गद्गदम् – अवरुद्ध स्वर से; भीत-भीतः– डरा-डरा सा;प्रणम्य– प्रणाम करके |

संजय ने धृतराष्ट्र से कहा- हे राजा! भगवान् के मुख से इन वचनों को सुनकर काँपते हुए अर्जुन ने हाथ जोड़कर उन्हें बारम्बार नमस्कार किया | फिर उसने भयभीत होकर अवरुद्ध स्वर में कृष्ण से इस प्रकार कहा |

तात्पर्य : जैसा कि पहले कहा जा चुका है, भगवान्के विश्र्वरूप केकारण अर्जुन आश्चर्यचकित था, अतः वह कृष्ण को बारम्बारनमस्कार करने लगा औरअवरुद्ध कंठ से आश्चर्य से वह कृष्ण की प्रार्थना मित्रके रूप में नहीं, अपितुभक्त के रूप में करने लगा |

अर्जुन उवाच |
स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या
जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च |
रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति
सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः || ३६ ||

अर्जुनः उवाच– अर्जुन नेकहा; स्थाने– यह ठीक है; हृषीक-ईश– हेइन्द्रियों के स्वामी; तव– आपके; प्रकीर्त्या– कीर्ति से; जगत्– सारा संसार;प्रहृष्यति– हर्षित हो रहाहै; अनुरज्यते– अनुरक्त हो रहा है; च– तथा; रक्षांसि– असुरगण; भीतानि– डर से; दिशः– सारी दिशाओं में; द्रवन्ति– भाग रहे हैं; सर्वे– सभी; नमस्यन्ति– नमस्कार करते हैं; च– भी; सिद्ध-सङ्घाः– सिद्धपुरुष |

अर्जुन ने कहा – हे हृषीकेश! आपके नाम के श्रवण से संसार हर्षित होताहै औरसभी लोग आपके प्रति अनुरक्त होते हैं | यद्यपि सिद्धपुरुष आपको नमस्कारकरतेहैं, किन्तु असुरगण भयभीत हैं और इधर-उधर भाग रहे हैं | यह ठीक ही हुआहै |

तात्पर्य:कृष्ण सेकुरुक्षेत्र युद्ध के परिणाम को सुनकर अर्जुन प्रवृद्ध हो गया और भगवान्के परम भक्त तथा मित्र के रूप में उनसे बोला कि कृष्ण जो कुछ करतेहैं, वहसब उचित है | अर्जुन ने पुष्टि की कि कृष्ण ही पालक हैं और भक्तों केआराध्यतथा अवांछित तत्त्वों के संहारकर्ता हैं | उनके सारे कार्य सबों केलिएसमान रूप से शुभ होते हैं | यहाँ पर अर्जुन यह समझ पाता है कि जब युद्धनिश्चितरूप से होना था तो अन्तरिक्ष से अनेक देवता, सिद्ध तथा उच्चतर लोकोंके बुद्धिमानप्राणी युद्ध को देख रहे थे, क्योंकि युद्ध में कृष्ण उपस्थितथे | जब अर्जुन नेभगवान् का विश्र्वरूप देखा तो देवताओं को आनन्द हुआ, किन्तु अन्य लोग जो असुर तथानास्तिक थे, भगवान् की प्रशंसा सुनकर सहन न करसके | वे भगवान् के विनाशकारी रूपसे डर कर भाग गये | भक्तों तथा नास्तिकोंके प्रति भगवान् के व्यवहार की अर्जुनद्वारा प्रशंसा की गई है | भक्तप्रत्येक अवस्था में भगवान् का गुणगान करता है,क्योंकि वह जानता है कि वेजो कुछ भी करते हैं, वह सबों के हित में है |

कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन्
गरीयसे ब्रह्मणोंऽप्यादिकर्त्रे |
अनन्त देवेश जगन्निवास
त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् || ३७ ||

कस्मात्– क्यों; च– भी; ते– आपको; न– नहीं; नमेरन्– नमस्कारकरें; महा-आत्मन्– हे महापुरुष; गरीयसे– श्रेष्ठतर लोग; ब्रह्मणः– ब्रह्माकीअपेक्षा; अपि– यद्यपि; आदि-कर्त्रे– परम स्त्रष्टा को; अनन्त– हेअनन्त; देव-ईश– हे ईशों के ईश; जगत्-निवास– हे जगत के आश्रय; त्वम्– आपहैं; अक्षरम्–अविनाशी; सत्-असत्– कार्य तथा कारण; तत्-परम्– दिव्य; यत्– क्योंकि |

हे महात्मा! आप ब्रह्मा से भी बढ़कर हैं, आपआदि स्त्रष्टा हैं | तोफिर आपको सादर नमस्कार क्यों न करें? हे अनन्त, हेदेवेश, हे जगन्निवास! आप परमस्त्रोत, अक्षर, कारणों के कारण तथा इस भौतिकजगत् के परे हैं |

तात्पर्य: अर्जुन इस प्रकार नमस्कारकरके सूचित करता है कि कृष्ण सबोंके पूजनीय हैं | वे सर्वव्यापी हैं औरप्रत्येक जीव की आत्मा हैं | अर्जुन कृष्णको महात्मा कहकर सम्बोधित करताहै, जिसका अर्थ है कि वे उदार तथा अनन्त हैं |अनन्त सूचित करता है कि ऐसाकुछ भी नहीं जो भगवान् की शक्ति और प्रभाव से आच्छादितन हो और देवेश काअर्थ है कि वे समस्त देवताओं के नियन्ता हैं और उन सबके ऊपर हैं| वे समग्रविश्र्व के आश्रय हैं | अर्जुन ने भी सोचा कि यह सर्वथा उपयुक्त है किसारेसिद्ध तथा शक्तिशाली देवता भगवान् को नमस्कार करते हैं, क्योंकि उनसेबढ़करकोई नहीं है | अर्जुन विशेष रूप से उल्लेख करता है कि कृष्ण ब्रह्मा सेभी बढ़करहैं, क्योंकि ब्रह्मा उन्हीं के द्वारा उत्पन्न हुए हैं | ब्रह्माका जन्म कृष्णके पूर्ण विस्तार गर्भोदकशायी विष्णु की नाभि से निकले कमलनालसे हुआ | अतःब्रह्मा तथा ब्रह्मा से उत्पन्न शिव एवं अन्य सारे देवताओं कोचाहिए कि उन्हें नमस्कार करें | श्रीमद्भागवत में कहा गया है कि शिव, ब्रह्मा तथा इन जैसे अन्यदेवता भगवान् का आदर करते हैं | अक्षरम् शब्दअत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यहजगत् विनाशशील है, किन्तु भगवान् इसजगत् से परे हैं | वे समस्त कारणों के कारण हैं, अतएव वे इस भौतिक प्रकृतिके तथा इस दृश्यजगत के समस्त बद्धजीवों से श्रेष्ठहैं | इसलिए वेपरमेश्र्वर हैं |

त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण-
स्त्वमस्य विश्र्वस्य परं निधानम् |
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम
त्वया ततं विश्र्वमनन्तरूप || ३८ ||

त्वम्– आप;आदि-देवः– आदि परमेश्र्वर; पुरुषः– पुरुष; पुराणः–प्राचीन, सनातन; त्वम्– आप; अस्य– इस; विश्र्वस्य– विश्र्व का; परम्– दिव्य;निधानम्– आश्रय; वैत्ता– जानने वाला; असि– हओ; वेद्यम्– जाननेयोग्य, ज्ञेय; च– तथा; परम्– दिव्य; च– और;धाम– वास, आश्रय; त्वया– आपके द्वारा; ततम्–व्याप्त; विश्र्वम्– विश्र्व; अनन्त-रूप– हे अनन्तरूप वाले |

आप आदि देव, सनातन पुरुष तथा इस दृश्यजगत केपरम आश्रय हैं | आप सबकुछ जानने वाले हैं और आप ही सब कुछ हैं, जो जाननेयोग्य है | आप भौतिक गुणों सेपरे परम आश्रय हैं | हे अनन्त रूप! यहसम्पूर्ण दृश्यजगत आपसे व्याप्त है |

तात्पर्य: प्रत्येकवस्तु भगवान् पर आश्रित है, अतः वे ही परम आश्रयहैं | निधानम् का अर्थ है – ब्रह्म तेज समेत सारी वस्तुएँ भगवान् कृष्ण पर आश्रितहैं | वे इस संसारमें घटित होने वाली प्रत्येक घटना को जानने वाले हैं और यदि ज्ञान का कोईअन्त है, तो वे ही समस्त ज्ञान के अन्त हैं | अतः वे ज्ञाता हैं और ज्ञेय (वेद्यं) भी | वे जानने योग्य हैं, क्योंकि वे सर्वव्यापी हैं | वैकुण्ठलोकमें कारण स्वरूप होने से वे दिव्य हैं | वे दिव्यलोक में भी प्रधान पुरुषहैं |

वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः
प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्र्च |
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः
पुनश्र्च भूयोऽपि नमो नमस्ते || ३९ ||

वायुः – वायु; यमः – नियन्ता; अग्निः – अग्नि; वरुणः – जल; शश-अङ्कः -चन्द्रमा; प्रजापतिः – ब्रह्मा; त्वम्- आप; प्र-पितामहः – परबाबा; च – तथा; नमः – मेरा नमस्कार;नमः – पुनः नमस्कार; ते – आपको; अस्तु – हो; सहस्त्र-कृत्वः- हजार बार; पुनः-च – तथा फिर; भूयः – फिर; अपि – भी; नमः -नमस्कार; नमःते – आपको मेरा नमस्कार है ।

आप वायु हैंतथा परम नियन्ता हैं । आप अग्नि हैं, जल हैं तथा चन्द्रमा हैं । आप आदिब्रह्मा हैं और आप प्रपितामह हैं । अतः आपको हजार बार नमस्कार है और पुनःनमस्कार है ।

तात्पर्य: भगवान् को वायु कहा गया है, क्योंकि वायु सर्वव्यापी होने के कारण समस्त देवताओं का मुख्य अधिष्ठाता है। अर्जुन कृष्ण को प्रपितामह (परबाबा) कहकर सम्बोधित करता है, क्योंकि वेविश्र्व के प्रथम जीव ब्रह्मा के पिता हैं ।

नमः पुरस्तादथ पृष्ठस्ते
नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व |
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं
सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः || ४० ||

नमः– नमस्कार; पुरस्तात्– सामने से; अथ– भी;पृष्ठतः– पीछे से; ते– आपको; नमः-अस्तु– मैं नमस्कार करता हूँ; ते– आपको; सर्वतः– सभी दिशाओंसे;एव– निस्सन्देह; सर्व– क्योंकि आप सब कुछ हैं; अनन्त-वीर्य– असीमपौरुष;अमित-विक्रमः– तथा असीम बल; त्वम्– आप; सर्वम्– सब कुछ; समाप्नोषि – आच्छादितकरते हो;ततः– अतएव; असि– हो;सर्वः– सब कुछ |

आपको आगे, पीछे, तथा चारों ओर से नमस्कार है | हे असीम शक्ति! आपअनन्तपराक्रम के स्वामी हैं | आप सर्वव्यापी हैं, अतः आप सब कुछ हैं |

तात्पर्य : कृष्ण के प्रेम से अभिभूत उनका मित्र अर्जुन सभी दिशाओं सेउनकोनमस्कार कर रहा है | वह स्वीकार करता है कि कृष्ण समस्त बल तथा पराक्रमकेस्वामी हैं और युद्धभूमि में एकत्र समस्त योद्धाओं से कहीं अधिक श्रेष्ठहैं |विष्णुपुराण में (१.९.६९) कहा गया है –

योऽयं तवागतो देव समीपं देवतागणः |
स त्वमेव जगत्स्त्रष्टा यतः सर्वगतो भवान् ||

“आपके समक्ष जो भी आता है, चाहे वह देवता ही क्यों नहो, हे भगवान्!वह आपके द्वारा ही उत्पन्न है |”

सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं
हे कृष्ण हे यादव हे सखेति |
अजानता महिमानं तवेदं
मया प्रमादात्प्रणयेन वापि || ४१ ||
यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि
विहारशय्यासनभोजनेषु |
एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं
तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् || ४२ ||

सखा– मित्र; इति– इस प्रकार; मत्वा– मानकर; प्रसभम्– हठपूर्वक; यत्– जो भी; उत्तम्– कहा गया; हे कृष्ण– हे कृष्ण; हे यादव– हे यादव; हे सखा – हेमित्र; इति– इस प्रकार; अजानता– बिना जाने; महिमानम्– महिमा को; तव– आपकी;इदम्– यह; मया– मेरे द्वारा; प्रमादात्– मूर्खतावश;प्रणयेन– प्यार वश; वा अपि– या तो; यत्– जो; च– भी; अवहास-अर्थम्– हँसी के लिए; असत्-कृतः – अनादर कियागया; असि– हो; विहार– आराम में; शय्या– लेटे रहनेपर; आसन– बैठे रहने पर;भोजनेषु– या भोजन करते समय;एकः– अकेले; अथवा– या; अपि– भी;अच्युत– हेअच्युत; तत्-समक्षम् – साथियों के बीच; तत्– उनसभी; क्षामये– क्षमाप्रार्थीहूँ; त्वाम्– आपसे; अहम्– मैं; अप्रमेयम्– अचिन्त्य |

आपको अपना मित्र मानते हुए मैंने हठपूर्वक आपकोहे कृष्ण, हे यादव, हेसखा जैसे सम्बोधनों से पुकारा है, क्योंकि मैं आपकीमहिमा को नहीं जानता था |मैंने मूर्खतावश या प्रेमवश जो कुछ भी किया है, कृपया उसके लिए मुझे क्षमा कर दें| यही नहीं, मैंने कई बार आराम करते समय, एकसाथ लेटे हुए या साथ-साथ खाते या बैठेहुए, कभी अकेले तो कभी अनेक मित्रोंके समक्ष आपका अनादर किया है | हे अच्युत!मेरे इन समस्त अपराधों को क्षमाकरें |

तात्पर्य : यद्यपि अर्जुन के समक्ष कृष्ण अपनेविराट रूप में हैं,किन्तु उसे कृष्ण के साथ अपना मैत्रीभाव स्मरण है | इसीलिए वह मित्रता के कारणहोने वाले अनेक अपराधों को क्षमा करने के लिएप्रार्थना कर रहा है | वह स्वीकारकरता है कि पहले उसे ज्ञात न था कि कृष्णऐसा विराट रूप धारण कर सकते हैं, यद्यपिमित्र के रूप में कृष्ण ने उसे यहसमझाया था | अर्जुन को यह भी पता नहीं था किउसने कितनी बार ‘हे मेरे मित्र’ ‘हे कृष्ण’ ‘हे यादव’ जैसे सम्बोधनों के द्वाराउनका अनादर किया है और उनकीमहिमा स्वीकार नहीं की | किन्तु कृष्ण इतने कृपालु हैंकि इतनेऐश्र्वर्यमण्डित होने पर भी अर्जुन से मित्र की भूमिका निभाते रहे | ऐसाहोता है भक्त तथा भगवान् के बीच दिव्य प्रेम का आदान-प्रदान | जीव तथाकृष्ण कासम्बन्ध शाश्र्वत रूप से स्थिर है, इसे भुलाया नहीं जा सकता, जैसाकि हम अर्जुन केआचरण में देखते हैं | यद्यपि अर्जुन विराट रूप का ऐश्र्वर्यदेख चुका है, किन्तुवह कृष्ण के साथ अपनी मैत्री नहीं भूल सकता |

पितासि लोकस्य चराचरस्य
त्वमस्य पूज्यश्र्च गुरुर्गरीयान् |
न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो
लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव || ४३ ||

पिता – पिता; असि – हो; लोकस्य – पूरे जगत के; चर – सचल; अचरस्य – तथाअचलों के; त्वम् – आप हैं ; अस्य – इसके; पूज्यः – पूज्य; च – भी; गुरुः -गुरु; गरीयान् – यशस्वी, महिमामय; न – कभी नहीं; त्वत्-समः – आपके तुल्य; अस्ति – है; अभ्यधिकः – बढ़ कर; कुतः – किस तरह सम्भव है; अन्यः – दूसरा; लोक-त्रये – तीनों लोकों में; अपि – भी; अप्रतिम-प्रभाव – हे अचिन्त्यशक्ति वाले ।

आप इस चर तथा अचर सम्पूर्ण दृश्यजगत के जनकहैं । आप परम पूज्य महान आध्यात्मिक गुरु हैं । न तो कोई आपके तुल्य है, नही कोई आपके समान हो सकता है । हे अतुल शक्ति वाले प्रभु! भला तीनों लोकोंमें आपसे बढ़कर कोई कैसे हो सकता है?

तात्पर्य: भगवान्कृष्ण उसी प्रकार पूज्य हैं, जिस प्रकार पुत्र द्वार पिता पूज्य होता है ।वे गुरु हैं क्योंकि सर्व प्रथम उन्हीं ने ब्रह्मा को वेदों का उपदेश दियाऔर इस समय अर्जुन को भगवद्गीता का उपदेश दे रहे हैं, अतः वे आदि गुरु हैंऔर इस समय किसी भी प्रामाणिक गुरु को कृष्ण से प्रारम्भ होने वालीगुरु-परम्परा का वंशज होना चाहिए । कृष्ण का प्रतिनिधि हुए बिना कोई न तोशिक्षक और न आध्यात्मिक विषयों का गुरु हो सकता है ।

भगवान् कोसभी प्रकार से नमस्कार किया जा रहा है । उनकी महानता अपरिमेय है । कोई भीभगवान् कृष्ण से बढ़कर नहीं, क्योंकि इस लोक में या वैकुण्ठ लोक में कृष्णके समान या उनसे बड़ा कोई नहीं है । सभी लोग उनसे निम्न हैं । कोई उनकों पारनहीं कर सकता । श्र्वेताश्र्वतर उपनिषद् में (६.८) कहा गया है कि –

न तस्य कार्यं करणं च विद्यते
न तत्समश्र्चाभ्यधिकश्र्च दृश्यते

भगवान् कृष्ण के भी सामान्य व्यक्ति की तरह इन्द्रियाँ तथा शरीर हैं, किन्तु उनके लिए अपनी इन्द्रियों, अपने शरीर, अपने मन तथा स्वयं में कोईअन्तर नहीं रहता । जो लोग मुर्ख हैं, वे कहते हैं कि कृष्ण अपने आत्मा, मन, हृदय तथा अन्य प्रत्येक वस्तु से भिन्न हैं । कृष्ण तो परम हैं, अतः उनकेकार्य तथा शक्तियाँ भी सर्वश्रेष्ठ हैं । यह भी कहा जाता है कि यद्यपिहमारे समान उनकी इन्द्रियाँ नहीं है , तो भी वे सारे ऐन्द्रिय कार्य करतेहैं । अतः उनकी इन्द्रियाँ न तो सीमित हैं, न ही अपूर्ण हैं । न तो कोईउनसे बढ़कर है, न उनके तुल्य कोई है । सभी लोग उनसे घट कर हैं ।

परम पुरुष का ज्ञान, शक्ति तथा कर्म सभी कुछ दिव्य हैँ । भगवद्गीता में (४.९) कहा गया है –

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः ।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ।।

जो कोई कृष्ण के दिव्य शरीर, कर्म तथा पूर्णता को जान लेता है, वह इस शरीरको छोड़ने के बाद उनके धाम को जाता है और फिर इस दुखमय संसार में वापस नहींआता । अतः मनुष्य को जान लेना चाहिए कि कृष्ण के कार्य अन्यों से भिन्नहोते हैं । सर्वश्रेष्ठ मार्ग तो यह है कि कृष्ण के नियमों का पालन कियाजाय, इससे मनुष्य सिद्ध बनेगा । यह भी कहा गया है कि कोई ऐसा नहीं जो कृष्णका गुरु बन सके, सभी तो उनके दास हैं । चैतन्य चरितामृत (आदि ५.१४२) सेइसकी पुष्टि होती है – एकले ईश्र्वर कृष्ण, आर सब भृत्य – केवल कृष्णईश्र्वर हैं, शेष सभी उनके दास हैं । प्रत्येक व्यक्ति उनके आदेश का पालनकरता है । ऐसा कोई नहीं जो उनके आदेश का उल्लंघन कर सके । प्रत्येक व्यक्तिउनकी अध्यक्षता में होने के कारण उनके निर्देश के अनुसार कार्य करता है ।जैसा कि ब्रह्मसंहिता में कहा गया है कि वे समस्त कारणों के कारण हैं ।

तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं
प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् |
पितेव पुत्रस्य सखेव सख्यु:
प्रियः प्रिययार्हसि देव सोढुम् || ४४ ||

तस्मात् – अतः; प्रणम्य – प्रणाम् करके; प्रणिधाय – प्रणत करके; कायम् -शरीर को; प्रसादये – कृपा की याचना करता हूँ; त्वाम् – आपसे; अहम् – मैं; ईशम् – भगवान् से; ईड्यम् – पूज्य; पिता इव – पिता तुल्य; पुत्रस्य– पुत्र का;सखा इव -मित्रवत्; सख्युः – मित्र का; प्रियः – प्रेमी; प्रियायाः – प्रिया का; अर्हसि – आपको चाहिए; देव – मेरे प्रभु; सोढुम् – सहन करना ।

आप प्रत्येक जीव द्वारा पूजनीय भगवान् हैं । अतः मैं गीरकर सादर प्रणामकरता हूँ और आपकी कृपा की याचना करता हूँ । जिस प्रकार पिता अपने पुत्र कीढिठाई सहन करता है, या मित्र अपने मित्र की घृष्टता सह लेता है, या प्रियअपनी प्रिया का अपराध सहन कर लेता है, उसी प्रकार आप कृपा करके मेरीत्रुटियों को सहन कर लें ।

तात्पर्य: कृष्ण के भक्त उनकेसाथ विविध प्रकार के सम्बन्ध रखते हैं – कोई कृष्ण को पुत्रवत्, कोई पतिरूप में, कोई मित्र रूप में या कोई स्वामी के रूप में मान सकता है । कृष्णऔर अर्जुन का सम्बन्ध मित्रता का है । जिस प्रकार पिता, पति या स्वामी सबअपराध सहन कर लेते हैं उसी प्रकार कृष्ण सहन करते हैं ।

अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा
भयेन च प्रव्यथितं मनो मे |
तदेव मे दर्शय देव रूपं
प्रसीद देवेश जगन्निवास || ४५ ||

अदृष्ट-पूर्वम् – पहले कभी न देखा गया; हृषितः – हर्षित; अस्मि -हूँ;दृष्ट्वा – देखकर; भयेन – भय के कारण; च – भी; प्रव्यथितम् – विचलित, भयभीत; मनः – मन; मे – मेरा; तत् – वह; एव – निश्चय ही; मे – मुझको; दर्शय -दिखलाइये; देव – हे प्रभु; रूपम् – रूप; प्रसीद – प्रसन्न होइये; देव-ईश -ईशों के ईश; जगत्-निवास – हे जगत के आश्रय ।

पहले कभी नदेखे गये आपके विराट रूप का दर्शन करके मैं पुलकित हो रहा हूँ, किन्तु साथही मेरा मन भयभीत हो रहा है । अतः आप मुझ पर कृपा करें और हे देवेश, हेजगन्निवास! अपना पुरुषोत्तम भगवत् स्वरूप पुनः दिखाएँ ।

तात्पर्य : अर्जुन को कृष्ण परविश्र्वास है, क्योंकि वह उनका प्रिय मित्रहै और मित्र रूप में वह अपने मित्र के ऐश्र्वर्य को देखकर अत्यन्त पुलकितहै । अर्जुन यह देख कर अत्यन्त प्रसन्न है कि उसके मित्र कृष्ण भगवान् हैंऔर वे ऐसा विराट रूप प्रदर्शित कर सकते हैं । किन्तु साथ ही वह यह विराटरूप को देखकर भयभीत है कि उसने अनन्य मैत्रीभाव के कारण कृष्ण के प्रतिअनेक अपराध किये हैं । इस प्रकार भयवश उसका मन विचलित है, यद्यपि भयभीतहोने का कोई कारण नहीं है । अतएव अर्जुन कृष्ण से प्रार्थना करता है कि वेअपने नारायण रूप दिखाएँ, क्योंकि वे कोई भी रूप धारण कर सकते हैं । यहविराट रूप भौतिक जगत के ही तुल्य भौतिक एवं नश्र्वर है । किन्तु वैकुण्ठलोकमें नारायण के रूप में उनका शाश्र्वत चतुर्भुज रूप रहता है । वैकुण्ठलोकमें असंख्य लोक है और कृष्ण इन सबमें अपने भिन्न नामों से अंश रूप मेंविद्यमान हैं । इस प्रकार अर्जुन वैकुण्ठलोक के उनके किसी एक रूप को देखनाचाहता था । निस्सन्देह प्रत्येकवैकुण्ठलोक में नारायण का स्वरूप चतुर्भुजी है, किन्तु इन चारों हाथों में वे विभिन्न क्रम में शंख, गदा, कमल तथा चक्रचिन्ह धारण किये रहते हैं । विभिन्न हाथों में इन चारों चिन्हों के अनुसारनारायण भिन्न-भिन्न नामों से पुकारे जाते हैं । ये सारे रूप कृष्ण के हीहैं, इसलिए अर्जुन कृष्ण के चतुर्भुज रूप का दर्शन करना चाहता था ।

किरीटिनं गदिनं चक्रहस्त-
मिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव |
तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन
सहस्रबाहो भव विश्र्वमूर्ते || ४६ ||

किरीटिनम् – मुकुट धारण किये; गदिनम् – गदाधारी; चक्रहस्तम् – चक्रधारणकिये;इच्छामि – इच्छुक हूँ; त्वाम् – आपको; द्रष्टुम् – देखना; अहम् -मैं; तथा एव – उसी स्थिति में; तेन-एव – उसी; रूपेण – रूप में; चतुःभुजेन -चार हाथों वाले; सहस्त्र-बाहों – हे हजार भुजाओं वाले; भव – हो जाइये; विश्र्व-मूर्ते – हे विराट रूप |

हे विराट रूप! हेसहस्त्रभुज भगवान्! मैं आपके मुकुटधारी चतुर्भुज रूप का दर्शन करना चाहताहूँ, जिसमें आप अपने चारों हाथों में शंख, चक्र, गदा तथा पद्म धारण कियेहुए हों | मैं उसी रूप को देखने की इच्छा करता हूँ |

तात्पर्य:ब्रह्मसंहिता में (५.३९) कहा गया है – रामादिमूर्तिषु कलानियमेनतिष्ठन् – भगवान् सैकड़ों हजारों रूपों में नित्य विद्यमान रहते हैं जिनमेंराम, नृसिंह, नारायण उनके मुख्य रूप हैं| रूप तो असंख्य हैं, किन्तु अर्जुनको ज्ञात था कि कृष्ण ही आदि भगवान् हैं, जिन्होंने यह क्षणिक विश्र्वरूपधारण किया है | अब वह प्रार्थना कर रहा है कि भगवान् अपने नारायण नित्यरूपका दर्शन दें | इस श्लोक से श्रीमद्भागवत के कथन की निस्सन्देह पुष्टि होतीहै कि कृष्ण आदि भगवान् हैं और अन्य सारे रूप उन्हीं से प्रकट होते हैं | वे अपने अंशों से भिन्न नहीं हैं और वे अपने असंख्य रूपों में भी ईश्र्वरही बने रहते हैं | इन सारे रूपों में वे तरुण दीखते हैं | यही भगवान् कास्थायी लक्षण है | कृष्ण को जानने वाला इस भौतिक संसार के समस्त कल्मष सेमुक्त हो जाता है |

श्रीभगवानुवाच |
मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं
रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् |
तेजोमयं विश्र्वमनन्तमाद्यं
यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम् || ४७ ||

श्रीभगवान् उवाच – श्रीभगवान् ने कहा; मया – मेरे द्वारा;प्रसन्नेन -प्रसन्न; तव – तुमको; अर्जुन – हे अर्जुन; इदम् – इस; रूपम् – रूप को; परम् – दिव्य; दर्शितम् – दिखाया गया; आत्म-योगात् – अपनी अन्तरंगाशक्ति से; तेजःमयम् – तेज से पूर्ण; विश्र्वम् – समग्र ब्रह्माण्ड को; अनन्तम् -असीम; आद्याम् – आदि; यत् – जो; मे- मेरा; त्वत् अन्येन – तुम्हारेअतिरिक्त अन्य के द्वारा;न दृष्ट पूर्वम् – किसी ने पहले नहीं देखा |

भगवान् ने कहा – हे अर्जुन! मैंने प्रसन्न होकर अपनी अन्तरंगा शक्ति के बलपर तुम्हें इस संसार में अपने इस परम विश्र्वरूप का दर्शन कराया है | इसकेपूर्व अन्य किसी ने इस असीम तथा तेजोमय आदि-रूप को कभी नहीं देखा था |

तात्पर्य: अर्जुन भगवान् के विश्र्वरूप को देखना चाहता था, अतः भगवान्कृष्ण ने अपने भक्त अर्जुन पर अनुकम्पा करते हुए उसे अपने तेजोमय तथाऐश्र्वर्यमय विश्र्वरूप का दर्शन कराया | यह रूप सूर्य की भाँति चमक रहा थाऔर इसके मुख निरन्तर परिवर्तित हो रहे थे | कृष्ण ने यह रूप अर्जुन कीइच्छा को शान्त करने के लिए ही दिखलाया | यह रूप कृष्ण कि उस अन्तरंगाशक्तिद्वारा प्रकट हुआ जो मानव कल्पना से परे है |अर्जुन से पूर्व भगवान् के इसविश्र्वरूप का किसी ने दर्शन नहीं किया था, किन्तु जब अर्जुन को यह रूपदिखाया गया तो स्वर्गलोक तथा अन्य लोकों के भक्त भी इसे देख सके | उन्होंनेइस रूप को पहले नहीं देखा था, केवल अर्जुन के कारण वे इसे देख पा रहे थे | दूसरे शब्दों में, कृष्ण की कृपा से भगवान् के सारे शिष्य भक्त उसविश्र्वरूप का दर्शन कर सके, जिसे अर्जुन देख रहा था | किसी ने टिका की हैकि जब कृष्ण सन्धिका प्रस्ताव लेकर दुर्योधन के पास गए थे, तो उसे भी इसीरूप का दर्शन कराया गया था | दुर्भाग्यवश दुर्योधन ने शान्ति प्रस्तावस्वीकार नहीं किया, किन्तु कृष्ण ने उस समय अपने कुछ रूप दिखाए थे | किन्तुवे रूप अर्जुन को दिखाए गये इस रूप से सर्वथा भिन्न थे | यह स्पष्ट कहागया है कि इस रूप को पहले किसी ने भी नहीं देखा था |

न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानै- र्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रै: |
एवंरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर || ४८ ||

न – कभी नहीं; वेद- यज्ञ – यज्ञ द्वारा; अध्ययनैः – या वेदों के अध्ययन से; न – कभी नहीं; दानैः – दान के द्वारा; न – कभी नहीं; च – भी; क्रियाभिः – पुण्य कर्मों से; न – कभी नहीं; तपोभिः – तपस्या के द्वारा; उग्रैः – कठोर; एवम्-रूपः – इस रूप में; शक्यः – समर्थ; अहम् – मैं; नृ-लोके – इस भौतिक जगत में; द्रष्टुम् – देखे जाने में; त्वत् – तुम्हारे अतिरिक्त; अन्येन – अन्य के द्वारा; कुरु-प्रवीर – कुरु योद्धाओं में श्रेष्ठ |

हे कुरुश्रेष्ठ! तुमसे पूर्व मेरे इस विश्र्वरूप को किसी ने नहीं देखा, क्योंकि मैं न तो वेदाध्ययन के द्वारा, न यज्ञ, दान, पुण्य या कठिन तपस्या के द्वारा इस रूप में, इस संसार में देखा जा सकता हूँ |

तात्पर्य: इस प्रसंग में दिव्य दृष्टि को भलीभाँति समझ लेना चाहिए | तो यह दिव्य दृष्टि किसके पास हो सकती है? दिव्य का अर्थ है दैवी | जब तक कोई देवता के रूप में दिव्यता प्राप्त नहीं कर लेता, तब तक उसे दिव्य दृष्टि प्राप्त नहीं हो सकती | और देवता कौन है? वैदिक शास्त्रों का कथन है कि जो भगवान् विष्णु के भक्त हैं, वे देवता हैं (विष्णुभक्ताः स्मृता देवाः) | जो नास्तिक हैं, अर्थात् जो विष्णु में विश्वास नहीं करते या जो कृष्ण के निर्विशेष अंश को परमेश्र्वर मानते हैं, उन्हें यह दिव्य दृष्टि नहीं प्राप्त हो सकती | ऐसा संभव नहीं है कि कृष्ण का विरोध करके कोई दिव्य दृष्टि भी प्राप्त कर सके | दिव्य बने बिना दिव्य दृष्टि प्राप्त नहीं की जा सकती | दूसरे शब्दों में, जिन्हें दिव्य दृष्टि प्राप्त है, वे भी अर्जुन की ही तरह विश्र्वरूप देख सकते हैं |

भगवद्गीता के विश्र्वरूप का विवरण है | यद्यपि अर्जुन के पूर्व वह विवरण अज्ञात था, किन्तु इस घटना के बाद अब विश्र्वरूप का कुछ अनुमान लगाया जा सकता है | जो लोग सचमुच ही दिव्य हैं, वे भगवान् के विश्र्वरूप को देख सकते हैं | किन्तु कृष्ण का शुद्धभक्त बने बिना कोई दिव्य नहीं बन सकता | किन्तु जो भक्त सचमुच दिव्य प्रकृति के हैं, और जिन्हें दिव्य दृष्टि प्राप्त हैं, वे भगवान् के विश्र्वरूप का दर्शन करने के लिए उत्सुक नहीं रहते | जैसा कि पिछले श्लोक में कहा गया है, अर्जुन ने कृष्ण के चतुर्भुजी विष्णु रूप को देखना चाहा, क्योंकि विश्र्वरूप को देखकर वह सचमुच भयभीत हो उठा था |

इस श्लोक में कुछ महत्त्वपूर्ण शब्द हैं, यथा वेदयज्ञाध्ययनैः जो वेदों तथा यज्ञानुष्ठानों से सम्बन्धित विषयों के अध्ययन का निर्देश करता है | वेदों का अर्थ हैं, समस्त प्रकार का वैदिक साहित्य यथा चारों वेद (ऋग्, यजु,साम तथा अथर्व) एवं अठारहों पुराण, सारे उपनिषद् तथा वेदान्त सूत्र | मनुष्य इस सबका अध्ययन चाहे घर में करे या अन्यत्र | इसी प्रकार यज्ञ विधि के अध्ययन करने के अनेक सूत्र हैं – कल्पसूत्र तथा मीमांसा-सूत्र | दानैः सुपात्र को दान देने के अर्थ से आया है; जैसे वे लोग जो भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में लगे रहते हैं, यथा ब्राह्मण तथा वैष्णव | इसी प्रकार क्रियाभिः शब्द अग्निहोत्र के लिए है और विभिन्न वर्णों के कर्मों के सूचक है | शारीरिक कष्टों को स्वेच्छा से अंगीकार करना तपस्या है | इस तरह मनुष्य भले ही इस कार्यों – तपस्या, दान, वेदाध्ययन आदि को करे, किन्तु जब तक अर्जुन की भाँति भक्त नहीं होता, तब तक वह विश्र्वरूप का दर्शन नहीं कर सकता | निर्विशेषवादी भी कल्पना करते रहते हैं कि वे भगवान् के विश्र्वरूप का दर्शन कर रहे हैं, किन्तु भगवद्गीता से हम जानते हैं कि निर्विशेषवादी भक्त नहीं हैं | फलतः वे भगवान् के विश्र्वरूप को नहीं देख पाते |

ऐसे अनेक पुरुष हैं जो अवतारों की सृष्टि करते हैं | वे झूठे ही सामान्य व्यक्ति को अवतार मानते हैं, किन्तु यह मुर्खता है | हमें तो भगवद्गीता का अनुसरण करना चाहिए, अन्यथा पूर्ण आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्ति की कोई सम्भावना नहीं है | यद्यपि भगवद्गीता को भगवत्तत्व का प्राथमिक अध्ययन माना जाता है, तो भी यह इतना पूर्ण है कि कौन क्या है, इसका अन्तर बताया जा सकता है | छद्म अवतार के समर्थक यह कह सकते हैं कि उन्होंने भी ईश्र्वर के दिव्य अवतार विश्र्वरूप को देखा है, किन्तु यह स्वीकार्य नहीं, क्योंकि यहाँ पर स्पष्ट उल्लेख हुआ है कि कृष्ण का भक्त बने बिना ईश्र्वरके विश्र्वरूप को नहीं देखा जा सकता | अतः पहले कृष्ण का शुद्धभक्त बनना होता है, तभी कोई दावा कर सकता है कि वह विश्र्वरूप का दर्शन कर सकता है, जिसे उसने देखा है | कृष्ण का भक्त कभी भी छद्म अवतारों को या इनके अनुयायियों को मान्यता नहीं देता |

न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानै-
र्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रै: |
एवंरूपः शक्य अहं नृलोके
द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर || ४८ ||

न – कभी नहीं; वेद- यज्ञ – यज्ञ द्वारा; अध्ययनैः – या वेदों के अध्ययनसे; न – कभी नहीं; दानैः – दान के द्वारा; न – कभी नहीं; च – भी; क्रियाभिः – पुण्य कर्मों से; न – कभी नहीं; तपोभिः – तपस्या के द्वारा; उग्रैः -कठोर; एवम्-रूपः – इस रूप में; शक्यः – समर्थ; अहम् – मैं; नृ-लोके – इसभौतिक जगत में; द्रष्टुम् – देखे जाने में; त्वत् – तुम्हारे अतिरिक्त; अन्येन – अन्य के द्वारा; कुरु-प्रवीर – कुरु योद्धाओं में श्रेष्ठ |

हे कुरुश्रेष्ठ! तुमसे पूर्व मेरे इस विश्र्वरूप को किसी ने नहीं देखा, क्योंकि मैं न तो वेदाध्ययन के द्वारा, न यज्ञ, दान, पुण्य या कठिन तपस्याके द्वारा इस रूप में, इस संसार में देखा जा सकता हूँ |

तात्पर्य: इस प्रसंग में दिव्य दृष्टि को भलीभाँति समझ लेना चाहिए | तो यहदिव्य दृष्टि किसके पास हो सकती है? दिव्य का अर्थ है दैवी | जब तक कोईदेवता के रूप में दिव्यता प्राप्त नहीं कर लेता, तब तक उसे दिव्य दृष्टिप्राप्त नहीं हो सकती | और देवता कौन है? वैदिक शास्त्रों का कथन है कि जोभगवान् विष्णु के भक्त हैं, वे देवता हैं (विष्णुभक्ताः स्मृता देवाः) | जोनास्तिक हैं, अर्थात् जो विष्णु में विश्वास नहीं करते या जो कृष्ण केनिर्विशेष अंश को परमेश्र्वर मानते हैं, उन्हें यह दिव्य दृष्टि नहींप्राप्त हो सकती | ऐसा सम्भव नहीं है कि कृष्ण का विरोध करके कोई दिव्यदृष्टि भी प्राप्त कर सके | दिव्य बने बिना दिव्य दृष्टि प्राप्त नहीं कीजा सकती | दूसरे शब्दों में, जिन्हें दिव्य दृष्टि प्राप्त है, वे भीअर्जुन की ही तरह विश्र्वरूप देख सकते हैं |

भगवद्गीतामेंविश्र्वरूप का विवरण है | यद्यपि अर्जुन के पूर्व वह विवरण अज्ञात था, किन्तु इस घटना के बाद अब विश्र्वरूप का कुछ अनुमान लगाया जा सकता है | जोलोग सचमुच ही दिव्य हैं, वे भगवान् के विश्र्वरूप को देख सकते हैं | किन्तुकृष्ण का शुद्धभक्त बने बिना कोई दिव्य नहीं बन सकता | किन्तु जो भक्तसचमुच दिव्य प्रकृति के हैं, और जिन्हें दिव्य दृष्टि प्राप्त हैं, वेभगवान् के विश्र्वरूप का दर्शन करने के लिए उत्सुक नहीं रहते | जैसा किपिछले श्लोक में कहा गया है, अर्जुन ने कृष्ण के चतुर्भुजी विष्णु रूप कोदेखना चाहा, क्योंकि विश्र्वरूप को देखकर वह सचमुच भयभीत हो उठा था |

इस श्लोक में कुछ महत्त्वपूर्ण शब्द हैं, यथा वेदयज्ञाध्ययनैः जो वेदोंतथा यज्ञानुष्ठानों से सम्बन्धित विषयों के अध्ययन का निर्देश करता है | वेदों का अर्थ हैं, समस्त प्रकार का वैदिक साहित्य यथा चारों वेद (ऋग्, यजु,साम तथा अथर्व) एवं अठारहों पुराण, सारे उपनिषद् तथा वेदान्त सूत्र | मनुष्य इस सबका अध्ययन चाहे घर में करे या अन्यत्र | इसी प्रकार यज्ञ विधिके अध्ययन करने के अनेक सूत्र हैं – कल्पसूत्र तथा मीमांसा-सूत्र| दानैःसुपात्र को दान देने के अर्थ से आया है; जैसे वे लोग जो भगवान् की दिव्यप्रेमाभक्ति में लगे रहते हैं, यथा ब्राह्मण तथा वैष्णव | इसी प्रकारक्रियाभिः शब्द अग्निहोत्र के लिए है और विभिन्न वर्णों के कर्मों के सूचकहै | शारीरिक कष्टों को स्वेच्छा से अंगीकार करना तपस्या है | इस तरहमनुष्य भले ही इस कार्यों – तपस्या, दान, वेदाध्ययन आदि को करे, किन्तु जबतक अर्जुन की भाँति भक्त नहीं होता, तब तक वह विश्र्वरूप का दर्शन नहीं करसकता | निर्विशेषवादी भी कल्पना करते रहते हैं कि वे भगवान् के विश्र्वरूपका दर्शन कर रहे हैं, किन्तु भगवद्गीता से हम जानते हैं कि निर्विशेषवादीभक्त नहीं हैं | फलतः वे भगवान् के विश्र्वरूप को नहीं देख पाते |

ऐसे अनेक पुरुष हैं जो अवतारों की सृष्टि करते हैं | वे झूठे ही सामान्यव्यक्ति को अवतार मानते हैं, किन्तु यह मुर्खता है | हमें तो भगवद्गीता काअनुसरण करना चाहिए, अन्यथा पूर्ण आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्ति की कोईसम्भावना नहीं है | यद्यपि भगवद्गीता को भगवत्तत्व का प्राथमिक अध्ययन मानाजाता है, तो भी यह इतना पूर्ण है कि कौन क्या है, इसका अन्तर बताया जासकता है | छद्म अवतार के समर्थक यह कह सकते हैं कि उन्होंने भी ईश्र्वर केदिव्य अवतार विश्र्वरूप को देखा है, किन्तु यह स्वीकार्य नहीं, क्योंकियहाँ पर स्पष्ट उल्लेख हुआ है कि कृष्ण का भक्त बने बिना ईश्र्वर केविश्र्वरूप को नहीं देखा जा सकता | अतः पहले कृष्ण का शुद्धभक्त बनना होताहै, तभी कोई दावा कर सकता है कि वह विश्र्वरूप का दर्शन कर सकता है, जिसेउसने देखा है | कृष्ण का भक्त कभी भी छद्म अवतारों को या इनके अनुयायियोंको मान्यता नहीं देता |

मा ते व्यथा मा च विमूढ़भावो
दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम् |
व्यपेतभी: प्रीतमनाः पुनस्त्वं
तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य || ४९ ||

मा – न हो; ते – तुम्हें; व्यथा – पीड़ा, कष्ट; मा – न हो; च – भी; विमूढ-भावः – मोह; दृष्ट्वा – देखकर; रूपम् – रूप को; घोरम् – भयानक; ईदृक् – इस; व्यपेत-भीः – सभी प्रकार के भय से मुक्त; प्रीत-मनाः – प्रसन्नचित्त; पुनः – फिर;त्वम् – तुम; तत् – उस; एव – इस प्रकार; मे – मेरे; रूपम् – रूप को; इदम् – इस;प्रपश्य – देखो |

तुम मेरेभयानक रूप को देखकर अत्यन्त विचलित एवं मोहित हो गये हो | अब इसे समाप्तकरता हूँ | हे मेरे भक्त! तुम समस्त चिन्ताओं से पुनः मुक्त हो जाओ | तुमशान्त चित्त से अब अपना इच्छित रूप देख सकते हो |

तात्पर्य:भगवद्गीता के प्रारम्भ में अर्जुन अपने पूज्य पितामह भीष्म तथागुरु द्रोण के वध के विषय में चिन्तित था | किन्तु कृष्ण ने कहा कि उसेअपने पितामह का वध करने से डरना नहीं चाहिए | जब कौरवों की सभा मेंधृतराष्ट्र के पुत्र द्रौपदी को विवस्त्र करना चाह रहे थे, तो भीष्म तथाद्रोण मौन थे, अतः कर्त्तव्यविमुख होने के कारण इनका वध होना चाहिए |कृष्णने अर्जुन को अपने विश्र्वरूप का दर्शन यह दिखाने के लिए कराया कि ये लोगअपने कुकृत्यों के कारण पहले ही मारे जा चुके हैं | यह दृश्य अर्जुन कोइसलिए दिखलाया गया, क्योंकि भक्त शान्त होते हैं और ऐसे जघन्य कर्म नहीं करसकते | विश्र्वरूप प्रकट करने का अभिप्राय स्पष्ट हो चूका था | अब अर्जुनकृष्ण के चतुर्भुज रूप को देखना चाह रहा था | अतः उन्होंने यह रूप दिखाया |भक्त कभी भी विश्र्वरूप देखने में रूचि नहीं लेता क्योंकि इससेप्रेमानुभूति का आदान-प्रदान नहीं हो सकता | भक्त या तो अपना पूजाभावअर्पित करना चाहता है या दो भुजा वाले कृष्ण का दर्शन करना चाहता है जिससेवह भगवान् के साथ प्रेमाभक्ति का आदान-प्रदान कर सके |

सञ्जय उवाच |
इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा
स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः |
आश्र्वासयामास च भीतमेनं
भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा || ५० ||

सञ्जयःउवाच – संजय ने कहा;इति – इस प्रकार; अर्जुनम् – अर्जुन को; वासुदेवः – कृष्ण ने;तथा – उस प्रकार से; उक्त्वा – कहकर; स्वकम् – अपना, स्वीय; रूपम् – रूप को; दर्शयाम् आस- दिखलाया; भूयः – फिर; आश्र्वासयाम्आस- धीरज धराया; च – भी; भीतम् – भयभीत;एनम् – उसको; भूत्वा – होकर; पुनः -फिर; सौम्य वपुः – सुन्दर रूप; महा-आत्मा – महापुरुष |

संजय ने धृतराष्ट्र से कहा – अर्जुन से इस प्रकार कहने के बाद भगवान् कृष्णने अपना असली चतुर्भुज रूप प्रकट किया और अन्त में दो भुजाओं वाला रूपप्रदर्शित करके भयभीत अर्जुन को धैर्य बँधाया |

तात्पर्य:जब कृष्ण वासुदेव तथा देवकी के पुत्र के रूप में प्रकट हुए तो पहले वेचतुर्भुज नारायण रूप में ही प्रकट हुए, किन्तु जब उनके माता-पिता नेप्रार्थना की तो उन्होंने सामान्य बालक का रूप धारण कर लिया | उसी प्रकारकृष्ण को ज्ञात था कि अर्जुन उनके चतुर्भुज रूप को देखने का इच्छुक नहींहै, किन्तु चूँकि अर्जुन ने उनको इस रूप में देखने की प्रार्थना की थी, अतःकृष्ण ने पहले अपना चतुर्भुज रूप दिखलाया और फिर वे अपने दो भुजाओं वालेरूप में प्रकट हुए | सौम्यवपुः शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है | इसका अर्थहै अत्यन्त सुन्दर रूप | जब कृष्ण विद्यमान थे तो सारे लोग उनके रूप पर हीमोहित हो जाते थे और चूँकि कृष्ण इस विश्र्व के निर्देशक हैं, अतः उन्होंनेअपने भक्त अर्जुन का भय दूर किया और पुनः उसे अपना सुन्दर (सौम्य) रूपदिखलाया | ब्रह्मसंहिता में (५.३८) कहा गया है – प्रेमाञ्जनच्छुरितभक्तिविलोचनेन – जिस व्यक्ति की आँखों में प्रेमरूपी अंजन लगा है, वाहीकृष्ण के सौम्यरूप का दर्शन कर सकता है |

अर्जुन उवाच |
दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन |
इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः || ५१ ||

अर्जुनःउवाच – अर्जुन ने कहा; दृष्ट्वा – देखकर; इदम् – इस; मानुषम् -मानवी; रूपम् – रूप को; तव – आपके; सौम्यम् – अत्यन्त सुन्दर; जनार्दन – हेशत्रुओं को दण्डित करने वाले; इदानीम् – अब; अस्मि – हूँ; संवृत्तः -स्थिर; स-चेताः – अपनी चेतना में; प्रकृतिम् – अपनी प्रकृति को; गतः – पुनःप्राप्त हूँ |

जब अर्जुन ने कृष्ण को उनके आदि रूप मेंदेखा तो कहा – हे जनार्दन! आपके इस अतीव सुन्दर मानवी रूप को देखकर मैं अबस्थिरचित्त हूँ और मैंने अपनी प्राकृत अवस्था प्राप्त कर ली है |

तात्पर्य : यहाँ पर प्रयुक्त मानुषं रूपम् शब्द स्पष्ट सूचित करता हैं किभगवान् मूलतः दो भुजाओं वाले हैं | जो लोग कृष्ण को सामान्य व्यक्तिमानकरउनका उपहास करते हैं, उनको यहाँ पर भगवान् की दिव्य प्रकृति से अनभिज्ञबताया गया है | यदि कृष्ण मनुष्य होते तो उनके लिए पहले विश्र्वरूप और फिरचतुर्भुज नारायण रूप दिखा पाना कैसे सम्भव हो पाता? अतः भगवद्गीता में यहस्पष्ट उल्लेख है कि जो कृष्ण को सामान्य व्यक्ति मानता है और पाठक को यहकहकर भ्रान्त करता है कि कृष्ण के भीतर का निर्विशेष ब्रह्म बोल रहा है, वहसबसे बड़ा अन्याय करता है | कृष्ण ने सचमुच अपने विश्र्वरूप को तथाचतुर्भुज विष्णुरूप को प्रदर्शित किया | तो फिर वे किस तरह सामान्य पुरुषहो सकते हैं? शुद्ध भक्त कभी भी ऐसी गुमराह करने वाली टीकाओं से विचलितनहीं होता, क्योंकि वह वास्तविकता से अवगत रहता है | भगवद्गीता के मूलश्लोक सूर्य की भाँति स्पष्ट हैं, मूर्ख टीकाकारों को उन पर प्रकाश डालनेकी कोई आवश्यकता नहीं है |

श्रीभगवानुवाच |
सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम |
देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः || ५२ ||

श्रीभगवान् उवाच – श्रीभगवान् ने कहा; सु-दुर्दर्शम् – देख पाने मेंअत्यन्त कठिन; इदम् – इस; रूपम् – रूप को; दृष्टवान् असि – जैसा तुमनेदेखा; यत् – जो; मम – मेरे; देवाः – देवता; अपि – भी; अस्य – इस; रूपस्य -रूप का; नित्यम् – शाश्र्वत; दर्शन-काङ्क्षिणः – दर्शनाभिलाषी |

श्रीभगवान् ने कहा – हे अर्जुन! तुम मेरे जिस रूप को इस समय देख रहे हो, उसे देख पाना अत्यन्त दुष्कर है | यहाँ तक कि देवता भी इस अत्यन्त प्रियरूप को देखने की ताक में रहते हैं |

तात्पर्य: इस अध्यायके ४८वें श्लोक में भगवान् कृष्ण ने अपना विश्र्वरूप दिखाना बन्द किया औरअर्जुन को बताया कि अनेक तप, यज्ञ आदि करने पर भी इस रूप को देख पानाअसम्भव है | अब सुदुर्दर्शम् शब्द का प्रयोग किया जा रहा है जो सूचित करताहै कि कृष्ण का द्विभुज रूप और अधिक गुह्य है | कोई तपस्या, वेदाध्ययन तथादार्शनिक चिंतन आदि विभिन्न क्रियाओं के साथ थोड़ा सा भक्ति-तत्त्व मिलाकारकृष्ण के विश्र्वरूप का दर्शन संभवतः कर सकता है, लेकिन ‘भक्ति-तत्त्व’ केबिना यह संभव नहीं है, इसका वर्णन पहले ही किया जा चुका है | फिर भीविश्र्वरूप से आगे कृष्ण का द्विभुज रूप है, जिसे ब्रह्मा तथा शिव जैसेबड़े-बड़े देवताओं द्वारा भी देख पाना और भी कठिन है | वे उनका दर्शन करनाचाहते हैं और श्रीमद्भागवत में प्रमाण है कि जब भगवान् अपनी माता देवकी केगर्भ में थे, तो स्वर्ग के सारे देवता कृष्ण के चमत्कार को देखने के लिएआये और उन्होंने उत्तम स्तुतियाँ कीं, यद्यपि उस समय वे दृष्टिगोचर नहीं थे | वे उनके दर्शन की प्रतीक्षा करते रहे | मूर्ख व्यक्ति उन्हें सामान्य जनसमझकर भले ही उनका उपहास कर ले और उनका सम्मान न करके उनके भीतर स्थितकिसी निराकार’कुछ’ का सम्मान करे, किन्तु यह सब मूर्खतापूर्ण व्यवहार है | कृष्ण के द्विभुज रूप का दर्शन तो ब्रह्मा तथा शिव जैसे देवता तक करनाचाहते हैं |

भगवद्गीता (९.११) में इसकी पुष्टि हुई है -अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रीतम् – जो लोग उपहास करते हैं, वेउन्हें दृश्य नहीं होते | जैसा कि ब्रह्मसंहिता में तथा स्वयं कृष्ण द्वाराभगवद्गीता में पुष्टि हुई है , कृष्ण का शरीर सच्चिदानन्द स्वरूप है | उनका शरीर कभी भी भौतिक शरीर जैसा नहीं होता | किन्तु जो लोग भगवद्गीता याइसी प्रकार के वैदिक शास्त्रों को पढ़कर कृष्ण का अध्ययन करते हैं, उनके लिएकृष्ण समस्या बने रहते हैं | जो भौतिक विधि का प्रयोग करता है उसके लिएकृष्ण एक महान ऐतिहासिक पुरुष तथा अत्यन्त विद्वान चिन्तक हैं, यद्यपि वेसामान्य व्यक्ति हैं और इतने शक्तिमान होते हुए भी उन्हें भौतिक शरीर धारणकरना पड़ा | अन्ततोगत्वा वे परमसत्य को निर्विशेष मानते हैं, अतः वे सोचतेहैं कि भगवान् ने अपना निराकार रूप से ही साकार रूप धारण किया | परमेश्र्वरके विषय में ऐसा अनुमान भौतिकतावादी है| दूसरा अनुमान भी काल्पनिक है | जोलोग ज्ञान की खोज में हैं, वे भी कृष्ण का चिन्तन करते हैं और उन्हें उनकेविश्र्वरूप से कम महत्त्वपूर्ण मानते हैं | इस प्रकार कुछ लोग सोचते हैंकि अर्जुन के समक्ष कृष्ण का जो रूप प्रकट हुआ था, वह उनके साकार रूप सेअधिक महत्त्वपूर्ण है | उनके अनुसार कृष्ण का साकार रूप काल्पनिक है | उनकाविश्र्वास है कि परमसत्य व्यक्ति नहीं है | किन्तु भगवद्गीता के चतुर्थअध्याय में दिव्य विधि का वर्णन है और वह कृष्ण के विषय में प्रामाणिकव्यक्तियों से श्रवण करने की है | यही वास्तविक वैदिक विधि है और जो लोगसचमुच वैदिक परम्परा में है, वे किसी अधिकारी से ही कृष्ण के विषय मेंश्रवण करते हैं और बारम्बार श्रवण करने से कृष्ण उनके प्रिय हो जाते हैं | जैसा कि हम कई बार बता चुके हैं कि कृष्ण अपनी योगमाया शक्ति से आच्छादितहैं | उन्हें हर कोई नहीं देख सकता | वही उन्हें देख पाता है, जिसके समक्षवे प्रकट होते हैं | इसकी पुष्टि वेदों में हुई है , किन्तु जो शरणागत होचुका है, वह परमसत्य को सचमुच समझ पाता है | निरन्तर कृष्णभावनामृत से तथाकृष्ण की भक्ति से अध्यात्मिक आँखें खुल जाती हैं और वह कृष्ण को प्रकट रूपमें देख सकता है | ऐसा प्राकट्य देवताओं तक के लिए दुर्लभ है, अतः वे भीउन्हें नहीं समझ पाते और उनके द्विभुज रूप के दर्शन की ताक में रहते हैं | निष्कर्ष यह निकला कि यद्यपि कृष्ण के विश्र्वरूप का दर्शन कर पाना अत्यन्तदुर्लभ है और हर कोई ऐसा नहीं कर सकता, किन्तु उनके श्यामसुन्दर रूप को समझपाना तो और भी कठिन है |

नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया |
शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा || ५३ ||

न – कभी नहीं; अहम् – मैं; वेदैः – वेदाध्ययन से; न – कभी नहीं; तपसा -कठिन तपस्या द्वारा; न – कभी नहीं; दानेन – दान से; च – भी; इज्यया – पूजासे; शक्यः – संभव है; एवम् -विधः – इस प्रकार से; द्रष्टुम् – देख पाना; दृष्टवान् – देख रहे; असि – तुम हो; माम् – मुझको; यथा – जिस प्रकार |

तुम अपने दिव्य नेत्रों से जिस रूप का दर्शन कर रहे हो, उसे न तोवेदाध्ययन से, न कठिन तपस्या से, न दान से, न पूजा से ही जाना जा सकता है | कोई इन साधनों के द्वारा मुझे मेरे रूप में नहीं देख सकता |

तात्पर्य: कृष्ण पहले अपनी माता देवकी तथा पिता वासुदेव के समक्ष चतुर्भुजरूप में प्रकट हुए थे और तब उन्होंने अपना द्विभुज रूप धारण किया था | जोलोग नास्तिक हैं या भक्तिविहीन हैं, उनके लिए इस रहस्य को समझ पाना अत्यन्तकठिन है | जिन विद्वानों ने केवल व्याकरण विधि से या कोरी शैक्षिकयोग्यताओं के आधार पर वैदिक साहित्य का अध्ययन किया है, वे कृष्ण को नहींसमझ सकते | न ही वे लोग कृष्ण को समझ सकेंगे, जो औपचारिक पूजा करने के लिएमन्दिर जाते हैं | वे भले ही वहाँ जाते रहें, वे कृष्ण के असली रूप को नहींसमझ सकेंगे | कृष्ण को तो केवल भक्तिमार्ग से समझा जा सकता है, जैसा किकृष्ण ने स्वयं अगले श्लोक में बताया है |

भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन |
ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप || ५४ ||

भक्त्या – भक्ति से;तु – लेकिन; अनन्यया – सकामकर्म तथा ज्ञान के रहित; शक्यः – सम्भव; अहम् – मैं; एवम्-विधः – इस प्रकार; अर्जुन – हे अर्जुन; ज्ञातुम् – जानने; द्रष्टुम् – देखने; च – तथा; तत्त्वेन – वास्तव में; प्रवेष्टुम् – प्रवेश करने; च – भी; परन्तप – हे बलिष्ठ भुजाओं वाले |

हे अर्जुन! केवल अनन्य भक्ति द्वारा मुझे उस रूप में समझा जा सकता है, जिसरूप में मैं तुम्हारे समक्ष खड़ा हूँ और इसी प्रकार मेरा साक्षात् दर्शन भीकिया जा सकता है | केवल इसी विधि से तुम मेरे ज्ञान के रहस्य को पा सकतेहो |

तात्पर्य: कृष्ण को केवल अनन्य भक्तियोग द्वारा समझाजा सकता है | इस श्लोक में वे इसे स्पष्टतया कहते हैं, जिससे ऐसे अनाधिकारीटीकाकार जो भगवद्गीता को केवल कल्पना के द्वारा समझाना चाहते हैं, यह जानसकें कि वे समय का अपव्यय कर रहे हैं | कोई यह नहीं जान सकता कि वे किसप्रकार चतुर्भुज रूप में माता के गर्भ से उत्पन्न हुए और फिर तुरन्त ही दोभुजाओं वाले रूप में बदल गये | ये बातें न तो वेदों के अध्ययन से समझी जासकती है, न दार्शनिक चिंतन द्वारा | अतः यहाँ स्पष्ट कहा गया है कि न तोकोई उन्हें देख सकता है और न इन बातों का रहस्य ही समझ सकता है | किन्तु जोलोग वैदिक साहित्य के अनुभवी विद्यार्थी हैं वे अनेक प्रकार से वैदिकग्रंथों के माध्यम से उन्हें जान सकते हैं | इसके लिए अनेक विधि-विधान हैंऔर यदि कोई सचमुच उन्हें जानना चाहता है तो उसे प्रमाणिक ग्रंथों मेंउल्लिखित विधियों का पालन करना चाहिए | वह इन नियमों के अनुसार तपस्या करसकता है | उदाहरणार्थ, कठिन तपस्या के हेतु वह कृष्णजन्माष्टमी को, जोकृष्ण का आविर्भाव दिवस है, तथा मॉस की दोनों एकादशियों को उपवास कर सकताहै | जहाँ तक दान का सम्बन्ध है, यह बात साफ़ है कि उन कृष्ण भक्तों को यहदान दिया जाय जो संसार भर में कृष्ण-दर्शन को या कृष्णभावनामृत को फैलानेमें लगे हुए हैं | कृष्णभावनामृत मानवता के लिए वरदान है | रूप गोस्वामी नेभगवान् चैतन्य की प्रशंसा परम दानवीर के रूप में की है, क्योंकि उन्होंनेकृष्ण प्रेम का मुक्तरीति से विस्तार किया, जिसे प्राप्त कर पाना बहुत कठिनहै | अतः यदि कोई कृष्णभावनामृत का प्रचार करने वाले व्यक्तियों को अपनाधन दान में देता है, तो कृष्णभावनामृत का प्रचार करने के लिए दिया गया यहदान संसार का सबसे बड़ा दान है | और यदि कोई मंदिर में जाकर विधिपूर्वक पूजाकरता है (भारत के मन्दिरों में सदा कोई न कोई मूर्ति, सामान्यतया विष्णुया कृष्ण की मूर्ति रहती है) तो यह भगवान् की पूजा करके तथा उन्हें सम्मानप्रदान करके उन्नति करने का अवसर होता है | नौसिखियों के लिए भगवान् कीभक्ति करते हुए मंदिर-पूजा अनिवार्य है, जिसकी पुष्टि श्र्वेताश्र्वतरउपनिषद् में (६.२३) हुई है –

यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ |
तस्यैते कथिता ह्यार्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः ||

जिसमें भगवान् के लिए अविचल भक्तिभाव होता है और जिसका मार्गदर्शन गुरुकरता है, जिसमें भी उसकी वैसी ही अविचल श्रद्धा होती है, वह भगवान् कादर्शन प्रकट रूप में कर सकता है | मानसिक चिन्तन (मनोधर्म) द्वारा कृष्ण कोनहीं समझा जा सकता | जो व्यक्ति प्रामाणिक गुरु से मार्गदर्शन प्राप्त नहींकरता, उसके लिए कृष्ण को समझने का शुभारम्भ कर पाना भीकठिन है | यहाँ पर तुशब्द का प्रयोग विशेष रूप से यह सूचित करने के लिए हुआ है कि अन्य विधि नतो बताई जा सकती है, न प्रयुक्त की जा सकती है, न ही कृष्ण को समझने मेंसफल हो सकती है |

कृष्ण को चतुर्भुज तथा द्विभुज साक्षात् रूपअर्जुन को दिखाए गये क्षणिक विश्र्वरूप से सर्वथा भिन्न हैं | नारायण काचतुर्भुज रूप तथा कृष्ण का द्विभुज रूप दोनों ही शाश्र्वत तथा दिव्य हैं, जबकि अर्जुन को दिखलाया गया विश्र्वरूप नश्र्वर है | सुदुर्दर्शम् शब्द काअर्थ ही है “देख पाने में कठिन”, जिससे पता चलता है कि इस विश्र्वरूप कोकिसी ने नहीं देखा था | इससे यह भी पता चलता है कि भक्तों को इस रूप कोदिखाने की आवश्यकता भी नहीं थी | इस रूप को कृष्ण ने अर्जुन कीप्रार्थनापरदिखाया था, जिससे भविष्य में यदि कोई अपने को भगवान् का अवतार कहे तो लोगउससे कह सकें कि तुम अपना विश्र्वरूप दिखलाओ |

पिछले श्लोक में नशब्द की पुनरुक्ति सूचित करती है कि मनुष्य को वैदिक ग्रंथों के पाण्डित्यका गर्व नहीं होना चाहिए | उसे कृष्ण की भक्ति करनी चाहिए | तभी वहभगवद्गीता की टीका लिखने का प्रयास कर सकता है |

कृष्णविश्र्वरूप से नारायण के चतुर्भुज रूप में और फिर अपने सहज द्विभुज रूप मेंपरिणत होते हैं | इससे यह सूचित होता है कि वैदिक साहित्य में उल्लेखितचतुर्भुज रूप तथा अन्य रूप कृष्ण के आदि द्विभुज रूप ही से उद्भूत हैं | वेसमस्त उद्भवों के उद्गम हैं | कृष्ण इनसे भी भिन्न हैं, निर्विशेष रूप कीकल्पना का तो कुछ कहना ही नहीं | जहाँ तक कृष्ण के चतुर्भुजी रूपों कासम्बन्ध है, यह स्पष्ट कहा गया है कि कृष्ण का सर्वाधिक निकट चतुर्भुजी रूप (जो महाविष्णु के नाम से विख्यात हैं और जो कारणार्णव में शयन करते हैंतथा जिनके श्र्वास तथा प्रश्र्वास में अनेक ब्रह्माण्ड निकलते एवं प्रवेशकरते रहते हैं) भी भगवान् का अंश है | जैसा कि ब्रह्मसंहिता में (५.४८) कहागया है –

यस्यैकनिश्र्वसितकालमथावलम्ब्य
जीवन्ति लोमविलजा जगदण्डनाथाः |
विष्णुर्महान् स इह यस्य कलाविशेषो
गोविन्दमादि पुरुषं तमहं भजामि ||

“जिनके श्र्वास लेने से ही जिनमें अनन्त ब्रह्माण्ड प्रवेश करते हैं तथापुनः बाहर निकल आते हैं, वे महाविष्णु कृष्ण के अंश रूप हैं | अतः मैंगोविन्द या कृष्ण की पूजा करता हूँ जो समस्त कारणों के कारण हैं |” अतःमनुष्य को चाहिए कि कृष्ण के साकार रूप को भगवान् मानकर पूजे, क्योंकि वहीसच्चिदानन्द स्वरूप है | वे विष्णु के समस्त रूपों के उद्गम हैं, वे समस्तअवतारों के उद्गम हैं और आदि महापुरुष हैं, जैसा कि भगवद्गीता से पुष्टहोता है |

गोपाल-तपनी उपनिषद् में (१.१) निम्नलिखित कथन आया है

सच्चिदानन्दरूपाय कृष्णायाक्लिष्टकारिणे |
नमो वेदान्तवेद्याय गुरवे बुद्धिसाक्षिणे ||

“मैं कृष्ण को प्रणाम करता हूँ को सच्चिदानन्द स्वरूप हैं | मैं उनकोनमस्कार करता हूँ, क्योंकि उनको जान लेने का अर्थ है, वेदों को जान लेना | अतः वे परम गुरु हैं |” उसी प्रकरण में कहा गया है – कृष्णो वै परमंदैवतम् – कृष्ण भगवान् हैं (गोपाल तापनी उपनिषद् १.३) | एको वशी सर्वगःकृष्ण ईड्यः – वह कृष्ण भगवान् हैं और पूज्य हैं | एकोऽपि सन्बहुधायोऽवभाति – कृष्ण एक हैं, किन्तु वे अनन्त रूपों तथा अंश अवतारों के रूपमें प्रकट होते हैं (गोपाल तापनी १.२१) |

ब्रह्मसंहिता (५.१) का कथन है-

ईश्र्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्दविग्रहः |
अनादिरादिर्गोविन्दः सर्वकारणकारणम् ||

“भगवान् तो कृष्ण हैं, जो सच्चिदानन्द स्वरूप हैं | उनका कोई आदि नहीं है, क्योंकि वे प्रत्येक वस्तु के आदि हैं | वे समस्त कारणों के कारण हैं |”

अन्यत्र भी कहा गया है – यात्रावतिर्णं कृष्णाख्यं परं ब्रह्म नराकृति -भगवान् एक व्यक्ति है, उसका नाम कृष्ण है और वह कभी-कभी इस पृथ्वी परअवतरित होता है | इसी प्रकार श्रीमद्भागवत में भगवान् के सभी प्रकार केअवतारों का वर्णन मिलता है, जिसमें कृष्ण का भी नाम है | किन्तु यह कहा गयाहै कि यह कृष्ण ईश्र्वर के अवतार नहीं हैं, अपितु साक्षात् भगवान् हैं (एते चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्) |

इसी प्रकारभगवद्गीता में भगवान् कहते हैं – मत्तः परतरं नान्यत – मुझ भगवान् कृष्ण केरूप से कोई श्रेष्ठ नहीं है | अन्यत्र भी कहा गया है – अहम् आदिर्हीदेवानाम् – मैं समस्त देवताओं का उद्गम हूँ | कृष्ण से भगवद्गीता ज्ञानप्राप्त करने पर अर्जुन भी इन शब्दों में इसकी पुष्टि करता है – परं ब्रह्मपरं धाम पवित्रं परमं भवान्| अब मैं भलीभाँति समझ गया कि आप परम सत्यभगवान् हैं और प्रत्येक वस्तु के आश्रय हैं | अतः कृष्ण ने अर्जुन को जोविश्र्वरूप दिखलाया वह उनका आदि रूप नहीं है |आदि रूप तो कृष्ण है | हजारोंहाथों तथा हजारों सिरों वाला विश्र्वरूप तो उन लोगों का ध्यान आकृष्ट करनेके लिए दिखलाया गया, जिनका ईश्र्वर से तनिक भी प्रेम नहीं है | यह ईश्र्वरका आदि रूप नहीं है |

विश्र्वरूप उन शुद्धभक्तों के लिए तनिकभी आकर्षक नहीं होता, जो विभिन्न दिव्य सम्बन्धों में भगवान् से प्रेमकरते हैं | भगवान् अपने आदि कृष्ण रूप में ही प्रेम का आदान-प्रदान करतेहैं | अतः कृष्ण से घनिष्ठ मैत्री भाव से सम्बन्धित अर्जुन को यहविश्र्वरूप तनिक भी रुचिकर नहीं लगा, अपितु उसे भयानक लगा | कृष्ण के चिरसखा अर्जुन के पास अवश्य ही दिव्य दृष्टि रही होगी, वह भी सामान्य व्यक्ति नथा | इसीलिए वह विश्र्वरूप से मोहित नहीं हुआ | यह रूप उन लोगों को भले हीअलौकिक लगे, जो अपने को सकाम कर्मों द्वारा ऊपर उठाना चाहते हैं, किन्तुभक्ति में रत व्यक्तियों के लिए तो दोभुजा वाले कृष्ण का रूप ही अत्यन्तप्रिय है |

मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङगवर्जितः |
निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव || ५५ ||

मत्-कर्म-कृत – मेरा कर्म करने में रत; मत्-परमः – मुझको परम मानते हुए; मत्-भक्तः – मेरी भक्ति में रत; सङग-वर्जितः – सकाम कर्म तथा मनोधर्म केकल्मष से मुक्त; निर्वैरः – किसी से शत्रुरहित;सर्व-भूतेषु – समस्त जीवोंमें; यः – जो; माम् – मुझको; एति – प्राप्त करता है; पाण्डव – हे पाण्डु केपुत्र |

हे अर्जुन! जो व्यक्ति सकाम कर्मों तथा मनोधर्मके कल्मष से मुक्त होकर, मेरी शुद्ध भक्ति में तत्पर रहता है, जो मेरे लिएही कर्म करता है, जो मुझे ही जीवन-लक्ष्य समझता है और जो प्रत्येक जीव सेमैत्रीभाव रखता है, वह निश्चय ही मुझे प्राप्त करता है |

तात्पर्य: जो कोई चिन्मय व्योम के कृष्णलोक में परम पुरुष को प्राप्त करकेभगवान् कृष्ण से घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित करना चाहता है, उसे स्वयं भगवान्द्वारा बताये गये इस मन्त्र को ग्रहण करना होगा, अतः यह श्लोक भगवद्गीता कासार माना जाता है | भगवद्गीता एक ऐसा ग्रंथ है, जो उन बद्धजीवों की औरलक्षित है, जो इस भौतिक संसार में प्रकृति पर प्रभुत्व जताने में लगे हुएहैं और वास्तविक आध्यात्मिक जीवन के बारे में नहीं जानते हैं | भगवद्गीताका उद्देश्य यह दिखाना है कि मनुष्य किस प्रकार अपने आध्यात्मिक अस्तित्वको तथा भगवान् के साथ अपने सम्बन्ध को समझ सकता है तथा उसे यह शिक्षा देनाहै कि वह भगवद्धाम को कैसे पहुँच सकता है | यह श्लोक उस विधि को स्पष्ट रूपसे बताता है, जिससे मनुष्य अपने आध्यात्मिक कार्य में अर्थात् भक्ति मेंसफलता प्राप्त कर सकता है | भक्तिरसामृत सिन्धु में (२.२५५) कहा गया है-

अनासक्तस्य विषयान् यथार्हमुपयुञ्जतः |
निर्बन्धः कृष्णसम्बन्धे युक्तं वैराग्यमुच्यते ||

ऐसा कोई कार्य न करे जो कृष्ण से सम्बन्धित न हो | यह कृष्णकर्म कहलाता है | कोई भले ही कितने कर्म क्यों न करे, किन्तु उसे उनके फल के प्रति आसक्तिनहीं होनी चाहिए | यह फल तो कृष्ण को ही अर्पित किया जाना चाहिए | उदाहरणार्थ, यदि कोई व्यापार में व्यस्त है, तो उसे इस व्यापार कोकृष्णभावनामृत में परिणत करने के लिए, कृष्ण को अर्पित करना होगा | यदि कृष्णा व्यापार के स्वामी हैं, तो इसका लाभ भी उन्हें ही मिलना चाहिए | यदि किसी व्यापारी के पास करोड़ों रुपए की सम्पत्ति हो और यदि वह इसे कृष्ण को अर्पित करना चाहे, तो वहऐसा कर सकता है | यही कृष्णकर्म है | अपनी इन्द्रियतृप्ति के लिए विशाल भवनन बनवाकर, वह कृष्ण के लिए सुन्दर मंदिर बनवा सकता है, कृष्ण काअर्चाविग्रह स्थापित कर सकता है और भक्ति के प्रामाणिक ग्रंथों में वर्णितअर्चाविग्रह की सेवा का प्रबन्ध करा सकता है | यह सब कृष्णकर्म है | मनुष्यको अपने कर्मफल में लिप्त नहीं होना चाहिए, अपितु इसे कृष्ण को अर्पितकरके बची हुई वस्तु को केवल प्रसाद रूप में ग्रहण करना चाहिए | यदि कोईकृष्ण के लिए विशाल भवन बनवा देता है और उसमें कृष्ण का अर्चाविग्रहस्थापित कराता है, तो उसमें उसे रहने की मनाही नहीं रहती, लेकिन कृष्ण कोही इस भवन का स्वामी मानना चाहिए | यही कृष्णभावनामृत है | किन्तु यदि कोईकृष्ण के लिए मन्दिर नहीं बनवा सकता तो वह कृष्ण-मन्दिर की सफाई में तो लगसकता है, यह भी कृष्णकर्म है | वह बगीचे की देखभाल कर सकता है | जिसके पासथोड़ी सी भी भूमि है – जैसा कि भारत के निर्धन से निर्धन व्यक्ति के पास भीहोती है – तो वह उसका उपयोग कृष्ण के लिए फूल उगाने के लिए कर सकता है | वहतुलसी के वृक्ष उगा सकता है, क्योंकि तुलसीदल अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं औरभगवद्गीता में कृष्ण ने उनको आवश्यक बताया है | पत्रं पुष्पं फलं तोयम्| कृष्ण चाहते हैं कि लोग उन्हें पत्र, पुष्प, फल या थोड़ा जल भेंट करे और इसप्रकार की भेंट से वे प्रसन्न रहते हैं | यह पत्र विशेष रूप से तुलसीदल हीहै | अतः मनुष्य को चाहिए कि वह तुलसी का पौधा लगाकर उसे सींचे | इस तरहगरीब से गरीब व्यक्ति भी अपने को कृष्णसेवा में लगा सकता है | ये कतिपयउदाहरण हैं, जिस तरह कृष्णकर्म में लगा जा सकता है |

मत्परमःशब्द उस व्यक्ति के लिए आता है जो अपने जीवन का परमलक्ष्य, भगवान् कृष्ण केपरमधाम में उनकी संगति करना मानता है | ऐसा व्यक्ति चन्द्र, सूर्य यास्वर्ग जैसे उच्चतर लोकों में अथवा इस ब्रह्माण्ड के उच्चतम स्थानब्रह्मलोक तक में भी जाने का इच्छुक नहीं रहता | उसे इसकी तनिक भी इच्छानहीं रहती | उसकी आसक्ति तो आध्यात्मिक आकाश में जाने में रहती हैं | आध्यात्मिक आकाश में भी वह ब्रह्मज्योति से तादात्म्य प्राप्त करके भीसंतुष्ट नहीं रहता, क्योंकि वह तो सर्वोच्च आध्यात्मिक लोक में जाना चाहताहै, जिसे कृष्णलोक या गोलोक वृन्दावन कहते हैं | उसे उस लोक का पूरा ज्ञानरहता है, अतः वह अन्य किसी लोक को नहीं चाहता | जैसा कि मद्भक्तः शब्द सेसूचित होता है, वह भक्ति में पूर्णतया रत रहता है | विशेष रूप से वह श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वन्दन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन – भक्तिके इन नौ साधनों में लगा रहता है | मनुष्य चाहे तो इन नवों साधनों में रतरह सकता है अथवा आठ में, सात में, नहीं तो कम से कम एक में तो रत रह सकताहै | तब वह निश्चित रूप से कृतार्थ हो जाएगा |

सङग-वर्जितः शब्दभी महत्त्वपूर्ण है | मनुष्य को चाहिए कि ऐसे लोगों से सम्बन्ध तोड़ ले जोकृष्ण के विरोधी हैं | न केवल नास्तिक लोक कृष्ण के विरुद्ध रहते हैं, अपितु वे भी हैं, जो सकाम कर्मों तथा मनोधर्म के प्रति आसक्त रहते हैं | अतः भक्तिरसामृत सिन्धु में (१.१.११) शुद्धभक्ति का वर्णन इस प्रकार हुआ है –

अन्याभिलाषिताशून्यं ज्ञानकर्माद्यानावृतम् |
आनुकूल्येन कृष्णानुशिलनं भक्तिरुत्तमा ||

इस श्लोक में श्रील रूप गोस्वामी स्पष्ट कहते हैं कि यदि कोई अनन्य भक्तिकरना चाहता है, तो उसे समस्त प्रकार के भौतिक कल्मष से दूर रहना चाहिए जोसकामकर्म तथा मनोधर्म में आसक्त हैं | ऐसी अवांछित संगति तथा भौतिक इच्छाओंके कल्मष से मुक्त होने पर ही वह कृष्ण ज्ञान का अनुशीलन कर सकता है, जिसेशुद्ध भक्ति कहते हैं | आनुकूल्यस्य संकल्प प्रातिकूल्यस्य वर्जनम् (हरी भक्ति विलास ११.६७५) | मनुष्य को चाहिए कि अनुकूल भाव से कृष्ण के विषय में सोचे और उन्हीं ले लिएकर्म करे, प्रतिकूल भाव से नहीं | कंस कृष्ण का शत्रु था | वह कृष्ण केजन्म से ही उन्हें मारने की तरह-तरह की योजनाएँ बनाता रहा | किन्तु असफलहोने के कारण वह सदैव कृष्ण का चिन्तन करता रहा, किन्तु उसकी वह कृष्णभावनाअनुकूल न थी, अतः चौबीस घंटे कृष्ण का चिन्तन करते रहने पर भी वह असुर हीमाना जाता रहा और अन्त में कृष्ण द्वारा मार डाला गया | निस्सन्देह कृष्णद्वारा वध किये गये व्यक्ति को तुरन्त मोक्ष मिल जाता है, किन्तु शुद्धभक्तका उद्देश्य यह नहीं है | शुद्धभक्त तो मोक्ष की भी कामना नहीं करता | वहसर्वोच्च्लोक, गोलोक वृन्दावन भी नहीं जाना चाहता | उसका एकमात्र उद्देश्यकृष्ण की सेवा करना है, चाहे वह जहाँ भी रहे |

कृष्णभक्तप्रत्येक से मैत्रीभाव रखता है | इसीलिए यहाँ उसे निर्वैरः कहा गया हैअर्थात् उसका कोई शत्रु नहीं होता | यह कैसे सम्भव है? कृष्णभावनामृत मेंस्थित भक्त जानता है कि कृष्ण की भक्ति ही मनुष्य जीवन की समस्त समस्याओंसे छुटकारा दिला सकती है | इसे उसका व्यक्तिगत अनुभव रहता है | फलतः वह इसप्रणाली को – कृष्णभावनामृत को – मानव समाज में प्रचारित करना चाहता है | भगवद्भक्तों का इतिहास साक्षी है कि ईश्र्वर चेतना का प्रचार करने के लिएकई बार भक्तों को अपने जीवन को संकटों में डालना पड़ा | सबसे उपयुक्त उदाहरणजीसस क्राइस्ट का है | उन्हें अभक्तों ने शूली पर चढ़ा दिया, किन्तुउन्होंने अपना जीवन कृष्णभावनामृत के प्रसार में उत्सर्ग किया | निस्सन्देहयह कहना कि वे मारे गये ठीक नहीं है | इसी प्रकार भारत में भी अनेक उदाहरणहैं, यथा प्रहलाद महाराज तथा ठाकुर हरिदास | ऐसा संकट उन्होंने क्योंउठाया ? क्योंकि वे कृष्णभावनामृत का प्रसार करना चाहते थे और यह कठिनकार्य है | कृष्णभावनाभावित व्यक्ति जानता है कि मनुष्य कृष्ण के साथ अपनेसम्बन्ध को भूलने के कारण ही कष्ट भोग रहा है | अतः मानव समाज की सबसे बड़ीसेवा होगी कि अपने पड़ोसी को समस्त भौतिक समस्याओं से उबारा जाय | इस प्रकारशुद्धभक्त भगवान् की सेवा में लगा रहता है | तभी हम समझ सकते हैं कि कृष्णउन लोगों पर कितने कृपालु हैं, जो उनकी सेवा में लगे रहकर उनके लिए सभीप्रकार के कष्ट सहते हैं | अतः यह निश्चित है कि ऐसे लोग इस शरीर छोड़ने केबाद परमधाम को प्राप्त होते हैं |

सारांश यह कि कृष्ण ने अपनेक्षणभंगुर विश्र्वरूप के साथ-साथ काल रूप जो सब कुछ भक्षण करने वाला है औरयहाँ तक कि चतुर्भुज विष्णुरूप को भी दिखलाया | इस तरह कृष्ण इन समस्तस्वरूपों के उद्गम हैं | ऐसा नहीं है कि वे आदि विश्र्वरूप या विष्णु की हीअभिव्यक्ति हैं | वे समस्त रूपों के उद्गम हैं | विष्णु तो हजारों लाखोंहैं, लेकिन भक्त के लिए कृष्ण का कोई अन्य रूप उतना महत्त्वपूर्ण नहीं, जितना कि मूल दोभूजी श्यामसुन्दर रूप | ब्रह्मसंहिता में कहा गया है कि जोप्रेम या भक्तिभाव से कृष्ण के श्यामसुन्दर रूप के प्रति आसक्त हैं, वेसदैव उन्हें अपने हृदय में देख सकते हैं, और कुछ भी नहीं देख सकते | अतःमनुष्य को समझ लेना चाहिए कि इस ग्यारहवें अध्याय का तात्पर्य यही हैकिकृष्ण का रूप ही सर्वोपरि है एवं परम सार है |

इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय “विराट रूप” का भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूरा हुआ |

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